Monday, August 4, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 50

"इसलिए, क्योंकि मैं नही चाहता कि किसी व्यक्ति की दृष्टि यहाँ आते हुए मुझ पर पड़े. क्योंकि मैं एक सरकारी आदमी हूँ. अगर किसी कि दृष्टि मुझ पर पड़ गई तो मैं जेल के अन्दर हो जाऊँगा."
"किंतु मुझ पर अपनी अस्लियत खोलने में क्या हर्ज है? आज तक तुम ने नही बताया कि तुम कौन हो." गंगाराम ने कहा उससे.
"इसकी तुम परवाह क्यों करते हो? हमारे बीच एक अनुबंध हुआ है. जिसके अनुसार पोर्ट्रेट के सौदे का तीस परसेंट मेरा होगा. फिर इससे तुम्हें क्या मतलब कि मैं कौन हूँ." दाढी वाले ने कहा.
"ठीक है. तुम सही कहते हो." गंगाराम ठंडी साँस लेकर बोला, "मुझे तो केवल तुम्हारी दी हुई सूचनाओं से मतलब होना चाहिए."
"और वह तुम्हें परफेक्ट मिलेंगी." दाढीवाले ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया.
"चलूँ. अब आर्टिस्ट को चेक करुँ." गंगाराम बड़बड़ाया और फिर वह भी जाने के लिए उठ खड़ा हुआ.
......................
मुसीबतचंद कंधे पर अपना सामान लादकर हंसराज के घर से काफी दूर निकल आया था. उसका इरादा वापस अपने गाँव जाने का था. अतः वह बस स्टैंड की दिशा में जा रहा था. अचानक उसकी दृष्टि किनारे लगे हुए एक साइन बोर्ड पर पड़ी. उस बोर्ड के अनुसार वहां किसी फोटोग्राफर का स्टूडियो था.
"ओह, मैं तो भूल ही गया था कि पासपोर्ट के लिए मुझे फोटो खिंचवाना है. चलो ये काम भी कर लेता हूँ. फिर गाँव जाऊँगा." वह बड़बड़ाया और स्टूडियो की ओर अपने पग बढ़ा दिए.
वह जब दुकान में प्रविष्ट हुआ तो फोटोग्राफर मेज़ पर झुका हुआ ब्रश से किसी फोटो का शेड ठीक कर रहा था. उसने मुसीबतचंद की ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा.
"मैं पासपोर्ट के लिए फोटो खिंचवाना चाहता हूँ." मुसीबतचंद ने बताया.
"सउदी अरब जाने के लिए?" फोटोग्राफर ने पूछा.
"आपको कैसे मालूम हुआ?"आश्चर्य से मुसीबतचंद ने प्रश्न किया.
"क्योंकि यहाँ आने वाले सौ में से नब्बे लोग पासपोर्ट इसी लिए बनवाते हैं. आप पाँच मिनट बैठिये, अभी फोटो खींचता हूँ." फोटोग्राफर ने कहा.
मुसीबतचंद वहां बैठकर चारों ओर लगे फोटोग्राफ देखने लगा. कुछ हाथ की बनी पेंटिंग्स भी वहां लगी थीं. उन्हें देखकर मुसीबतचंद ने पूछा, "क्या आप हाथ से भी फोटो खींचते हैं?"
"मैं हमेशा कैमरे का बटन हाथ से ही दबाता हूँ." फोटोग्राफर ने कहा.
"मेरा मतलब इन तस्वीरों से है."
"ओह, ये तस्वीरें. जी हाँ, मैं ने इसे हाथ से बनाया है. क्योंकि फोटोग्राफर होने के साथ साथ मैं एक आर्टिस्ट भी हूँ."
उसी समय गंगाराम वहां प्रविष्ट हुआ और आर्टिस्ट उसकी ओर आकृष्ट हो गया.
गंगाराम ने अपनी जेब से एक फोटोग्राफ निकाला और उसे फोटोग्राफर की और बढाया. ये फोटोग्राफ लेओनार्दो के पोर्ट्रेट का था.
"मेरे एक मित्र ने यहाँ से इस प्रकार की कुछ तस्वीरें बनवाई थीं." गंगाराम ने फोटोग्राफ दिखाते हुए कहा.
"जी हाँ. एक सज्जन ने इस प्रकार की एक तस्वीर बनवाई थी. बहुत अच्छी तस्वीर थी. और उसे बनाते समय मुझे काफी आनंद आया था." आर्टिस्ट ने कहा.
"मैं यह जानना चाहता हूँ कि उन्होंने इसकी कितनी कापिया बनवाई थीं? बात ये है कि मैं अपने मित्र से उसकी एक कापी लेना चाहता हूँ. लेकिन उसका कहना है कि उसने पोर्ट्रेट कि केवल एक कापी बनवाई है."
"जी हाँ. उन्होंने केवल एक ही तस्वीर बनवाई थी. लेकिन मैं ने दो कापिया तैयार की थीं. एक उन्हें देने के लिए और दूसरी अपने स्टूडियो की शोभा बढ़ाने के लिए." आर्टिस्ट ने बताया.
"ओह! किंतु वह दूसरी तस्वीर तो कहीं दिखाई नही पड़ रही है?" गंगाराम ने स्टूडियो का निरीक्षण करते हुए कहा.
"मैं ने दूसरी तस्वीर उसी दिन एक दूसरे सज्जन के हाथों बेच दी थी." आर्टिस्ट ने वह हाथ नीचे लटकते हुए कहा जिस में उस ने फोटोग्राफ पकड़ रखा था. इस प्रकार पोर्ट्रेट का सीधा भाग अब मुसीबतचंद के सामने पड़ गया और वह उसे देखकर चौंक उठा. आर्ट गैलरी का पोर्ट्रेट अभी उसकी स्मृति में पूरी तरह था.
"क्या आप उसका हुलिया बता सकते हैं?" गंगाराम ने पूछा.
"क्या कोई खास बात है?" फोटोग्राफर ने गौर से गंगाराम की और देखा.
"हाँ. बात तो कुछ ऐसी ही है. " गंगाराम ने गहरी साँस खींची, "मैं सी. बी. आई का अफसर हूँ, और एक केस के सम्बन्ध में जांच कर रहा हूँ."
"तो ये बात है. मुझे पूरी तरह हुलिए का तो ध्यान नहीं, किंतु जो कुछ मुझे याद है, मैं बताने की कोशिश करता हूँ."
फ़िर फोटोग्राफर ने जो हुलिया बताया वह पूरी तरह हंसराज का था. जिसे सुनकर मुसीबतचंद जोरों से चौंका. किंतु अच्छा ये था कि गंगाराम का ध्यान उधर नही था वरना उसे संदेह हो जाता कि मुसीबतचंद का पोर्ट्रेट से कुछ न कुछ सम्बन्ध है.
"तुमने वह पोर्ट्रेट काफी जानदार बनाया था. क्या ऐसा नही हो सकता कि अपनी याददाश्त के बल पर उस आदमी का चित्र बना दो, जिसने तुम से बाद में पोर्ट्रेट ख़रीदा था."
"कोशिश कर सकता हूँ." चित्रकार ने कहा.
"अगर तुम वह चित्र बना सको तो हमारा काफी काम आसान हो जाएगा. इसके लिए तुम्हें इनाम भी मिलेगा."
"मैं पूरी कोशिश करूंगा. आपको कल सुबह तक चित्र तैयार मिलेगा."
"ठीक है. मैं कल आऊंगा. तुम ये रुपये एडवांस रखो." गंगाराम ने पाँच सौ का पत्ता जेब से निकल कर चित्रकार की ओर बढ़ा दिया.
.........continued

1 comment:

महामंत्री-तस्लीम said...

कहानी अपने शबाब पर है।