tag:blogger.com,1999:blog-37316813232856892062008-07-03T04:21:02.147-07:00Hindi Fiction Writerzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comBlogger43125tag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-52983863394803850652008-06-28T23:05:00.000-07:002008-06-28T23:06:28.152-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 42"मैं दस लाख डालर ज़रूर दूँगा. लेकिन इससे पहले मैं निश्चिंत हो जाना चाहता हूँ कि पोर्ट्रेट असली ही है."<br />"नकली होने का तो कोई सवाल ही नही उठता. क्योंकि मेरे कार्यकर्ताओं ने बहुत मुश्किल से इसे हासिल किया है. फिर भी मैं पोर्ट्रेट आपके सामने रख देता हूँ. आप ख़ुद ही फैसला कर लें."<br />मनोहरश्याम उठा, और गुप्त अलमारी से पोर्ट्रेट निकालने लगा. कुछ देर बाद पोर्ट्रेट एडगर के सामने मेज़ पर था. और तीनों व्यक्ति ध्यान से पोर्ट्रेट को देख रहे थे.<br />"मि. विलियम!" एडगर ने भूरे सूट वाले को संबोधित किया, "आप उरानो कलाकृतियों को पहचानने में माहिर हैं. क्या आप बता सकते हैं कि ये पोर्ट्रेट असली है या नकली?"<br />"मैं अभी इसका पता करता हूँ." विलियम ने कहा. और पोर्ट्रेट का निरीक्षण करने लगा. फिर उसने जेब से एक आतिशी शीशा निकला और गहराई के साथ पोर्ट्रेट की लकीरें देखने लगा.<br />निरीक्षण के बाद उसने कहा , "ये पोर्ट्रेट नकली है."<br />एडगर ने मनोहरश्याम की तरफ देखा.<br />"क्या कहते हो! तुम फिर से इसका निरीक्षण करो. इसके नकली होने का प्रश्न ही नही उठता." मनोहरश्याम बोला.<br />"मैं ये बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ. ये पोर्ट्रेट नकली है. लेओनार्दो ने अपनी कलाकृति बनाने में पतले ब्रश के स्ट्रोक्स दिए थे. जबकि इस पोर्ट्रेट के स्ट्रोक्स मोटे ब्रश के हैं. और ओरिजनल से बहुत ज़्यादा अलग हैं."<br />"मुझे भी यही शक था." एडगर बोला, "क्योंकि आर्ट गैलरी में अभी भी पोर्ट्रेट रखा हुआ है और लोग उसे देखने जा रहे हैं."<br />"वह बदला हुआ पोर्ट्रेट है. जिसे मेरे साथियों ने असली के स्थान पर रख दिया था." मनोहरश्याम ने अपनी बात पर बल दिया.<br />"ये तो तुम कह रहे हो. लेकिन मुझे मि. विलियम पर पूरा यकीन है. उनका अन्वेषण ग़लत नही हो सकता. इस लिए हमें धोखा देने की कोशिश मत करो. और अगर असली पोर्ट्रेट हासिल कर चुके हो तो हमें दे दो." इस बार एडगर की आवाज़ तेज़ हो गई थी.<br />"देखिये मि. एडगर, अपने हम से दस लाख डालर में इस पोर्ट्रेट को हासिल करने का सौदा किया. हम ने आर्ट गैलरी में खतरों से खेलते हुए इसे उड़ाया. अब अच्छा यही है कि हमें पेमेंट दीजिये और पोर्ट्रेट ले जाइए. हमारी ज़िम्मेदारी अब ख़त्म हो चुकी है." मनोहरश्याम कि आवाज़ भी तेज़ हो चुकी थी.<br />"देखिये मि. मनोहर, दस लाख डालर हम तभी दे सकते हैं जब हमें असली पोर्ट्रेट मिलेगा. वैसे ये नक़ल भी बहुत शानदार तैयार कि गई है. इसके लिए मैं आपको सौ डालर देने के लिए तैयार हूँ." एडगर ने नकली पोर्ट्रेट हाथ में लेकर कहा.<br />मनोहरश्याम का चेहरा क्रोध के कारन लाल हो गया. उसने अपने पैर के पास लगा गुप्त बटन दबाया. चूंकि उसके आगे मेज़ थी अतः एडगर वगैरा उसकी हरकत नही देख पाए. कुछ ही पल बीते थे कि तीन हट्टे कट्टे व्यक्ति अन्दर दाखिल हो गये.<br />"अब तो पोर्ट्रेट भी मेरे पास रहेगा और पैसे भी तुम्हें देने पड़ेंगे." मनोहरश्याम बोला और आने वालों को संबोधित किया, " इस व्यक्ति के हाथ से सूटकेस ले कर इन्हें बाहर निकल दो."<br />..........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-9795310904571614542008-06-24T05:21:00.000-07:002008-06-24T05:22:15.484-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 41"ये तो किसी इमारत में बम विस्फोट का समाचार है."<br />"क्या तुम्हें पोर्ट्रेट की चोरी से इसका कोई सम्बन्ध दिखाई दे रहा है?"<br />"भला इस बम विस्फोट का पोर्ट्रेट की चोरी से क्या सम्बन्ध हो सकता है?"<br />"पहले तो ये बताओ कि ये इमारत किस जगह पर है?" आई. जी राघवेन्द्र ने पूछा.<br />इं. दिनेश ने फिर समाचार पढ़ना आरम्भ किया, "ये इमारत तो....ओह, ये तो आर्ट गैलरी के पास है."<br />"हाँ. बम विस्फोट आर्ट गैलरी के पास की इमारत में हुआ. और इस विस्फोट का समय रात नौ बजे का है. मुझे पूरा यकीन है कि उसी समय कंट्रोल रूम में टी. वी. स्क्रीन पर गड़बड़ हुई थी.<br />.....चोरों का प्लान बहुत शानदार था. और उन्हें सुरक्षा प्रबंध की भी पूरी जानकारी थी. उनके एक ग्रुप ने पास की इमारत में बम विस्फोट किया जिससे आर्ट गैलरी के पहरेदार उधर निकल गये. फिर उनके दूसरे ग्रुप ने टी. वी. कैमरा अस्थाई रूप से ख़राब कर दिया. उसी समय उनके तीसरे ग्रुप ने असली पोर्ट्रेट चुराकर वहां नकली रख दिया." आई. जी ने कहा.<br />उसी समय वह सिपाही अन्दर प्रविष्ट हुआ जिसे इं. दिनेश ने फोन काल के बारे में पता करने भेजा था.<br />"क्या हुआ?" इं. दिनेश ने सिपाही की ओर देखा. <br />"उस काल के बारे में पता चल गया है सर." सिपाही ने कहा, "वो भरतपुर के एक पी. सी. ओ. से की गई थी."<br />"ठीक है. तुम जाओ." इं. दिनेश ने कहा और सिपाही बाहर चला गया.<br />"इसका मतलब ये हुआ कि पोर्ट्रेट दूसरे शहर में पहुँच गया है. इंसपेक्टर तुम्हें ख़ुद भरतपुर जाना होगा. क्योंकि इस केस में ज़्यादा लोगों को शामिल नही किया जा सकता." आई. जी. ने कहा.<br />"ठीक है सर, मैं भरतपुर जाने कि तय्यारी करता हूँ." इं. दिनेश ने कहा और बाहर निकल गया.<br />...................<br />"आइये मि. एडगर, लेओनार्दो का पोर्ट्रेट आपका इन्तिज़ार कर रहा है." मनोहरश्याम ने अपने विदेशी मेहमानों का स्वागत किया जो संख्या में तीन थे.<br />सबसे आगे वाला व्यक्ति माइक एडगर था. काला चश्मा, नीला हैट लगाये इस व्यक्ति ने नीला सूट पहन रखा था. उसके पीछे खड़े लाल टी शर्ट वाले व्यक्ति के शर्ट से झांकते जिस्म से अनुमान होता था कि वह अच्छा बॉडी बिल्डर है. उसने हाथ में एक सूटकेस पकड़ रखा था. उसकी बगल में तीसरा व्यक्ति खड़ा था जो कि भूरे रंग के थ्री पीस सूट में था.<br />ये वही कमरा था जिसमें इससे पहले मनोहरश्याम ने सौम्य इत्यादि से मुलाकात की थी.<br />आने वाले विदेशी मेहमान मनोहरश्याम के सामने कुर्सियों पर बैठ गये.<br />"तो मेरा ख्याल है कि सौदा पक्का हो गया है. मैं आपको दस लाख डालर के बदले में वह पोर्ट्रेट दे रहा हूँ." मनोहरश्याम ने कहा.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-15059315634826821842008-06-22T05:41:00.000-07:002008-06-22T05:42:58.897-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 40"देखो, अगर वो पोर्ट्रेट तुम्हारे पास है तो उसे वापस कर दो. क्योंकि उसमें पूरे देश की बदनामी होगी. अगर तुम यहाँ के नागरिक हो तो तुम्हें इसके बारे में सोचना चाहिए." इं. दिनेश ने समझाया.<br />"मैं ने आज तक अपने अलावा और किसी के बारे में नहीं सोचा. हाँ अगर सरकार इस पोर्ट्रेट के अच्छे दाम अदा कर दे तो मैं इसे बेच सकता हूँ." दूसरी ओर से कहा गया.<br />"ओह, तो तुम सरकार को ब्लैकमेल करने की सोच रहे हो."<br />"मेरा ख्याल है कि तुम्हारी समझ में मेरी बात नही आ रही है. मैं दो दिन बाद फिर फोन करूँगा. तब तक तुम अपने अफसरों से तै कर लेना कि पोर्ट्रेट की वापसी के लिए सरकार दस लाख डालर अदा कर सकती है या नही. अगर जवाब नही में हुआ तो उसी पल पोर्ट्रेट की चोरी का समाचार देश के साथ साथ विदेशों में भी फैल जायेगा."<br />कहने के साथ ही फोन कट गया. इं. दिनेश हेलो हेलो करता रहा, किंतु लाइन मौन हो गई थी.<br />रिसीवर क्रेडिल पर रखकर वो दुबारा आई जी के केबिन की तरफ़ बढ़ गया. जब वो अन्दर प्रविष्ट हुआ तो आई. जी. ने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.<br />"आपका विचार सही था." इं. दिनेश ने कहा और फोन पर हुई बातचीत सुना दी जिसे आई. जी. राघवेन्द्र ने पूरे ध्यान से सुना.<br />"मैं ने एक सिपाही को पता लगाने के लिए भेजा है कि ये काल कहाँ से की गई है. वह आता ही होगा." अंत में इं. दिनेश ने कहा.<br />"ये काम तुमने ठीक किया. हमें हर हाल में वह पोर्ट्रेट तीन दिनों के अन्दर हासिल करना है. क्योंकि इटली की सरकार ने जितने समय के लिए उसे दिया है, तीन दिनों के बाद वो पूरा हो जाएगा." आई. जी. राघवेन्द्र का चेहरा सपाट था.<br />"लेकिन आर्ट गैलरी में सख्त पहरा होते हुए ये चोरी किस तरह हो गई, यही आश्चर्य की बात है."<br />"जिस समय आर्ट गैलरी में चोरी हुई, कोई पहरेदार वहां नहीं था." आई. जी. ने कहा.<br />"कमाल है, ये कैसे हो सकता है?" इंस्पेक्टर के स्वर में विस्मय था.<br />"हाँ. ये समाचार देखो." अपने हाथ में पकड़ा अखबार उसने इं. दिनेश के सामने रखा और एक समाचार पर ऊँगली रखी.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-48517401588976884422008-06-12T09:26:00.000-07:002008-06-12T09:28:25.414-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 39"ये बात तो तै है कि ये काम एक अकेले व्यक्ति का नही है. क्योंकि अकेला व्यक्ति एक साथ टी.वी.कैमरे में गड़बड़ करके पोर्ट्रेट नही बदल सकता. रही बात पहरेदारों की, तो हो सकता है उन्होंने पहरेदारों को कहीं उलझा दिया हो."<br />"ये बात तो पहरेदारों के साथ पूछताछ में पता लग जायेगी कि उनके साथ उस समय क्या घटित हुआ." इं. दिनेश ने कहा.<br />"इस बारे में पहरेदारों से बात करना उचित नही होगा. क्योंकि हमें पोर्ट्रेट चोरी की बात लीक नही करनी है. ये बात पता करने के लिए हमें कोई और तरकीब ढूंढनी होगी." आई. जी. ने कहा.<br />उसी समय एक सिपाही अन्दर दाखिल हुआ और इं. दिनेश को संबोधित कर के बोला, "सर, फोन पर कोई व्यक्ति पोर्ट्रेट के सम्बन्ध में बात करना चाहता है."<br />"कैसी बात?" इं. दिनेश ने पूछा.<br />"पता नही, उसका कहना है कि वह एक बार और फोन कर चुका है."<br />"ओह, ये ज़रूर उसी व्यक्ति का फोन होगा, जिसके बारे में हम लोग बात कर रहे थे." इं. दिनेश ने आई. जी. से कहा और फिर फोन रिसीव करने के लिए कुर्सी से उठ खड़ा हुआ.<br />आई. जी ने भी साथ में उठना चाहा, फिर कुछ सोच कर रूक गया. और ताज़ा समाचार पत्र उठाकर पढने लगा, जिसमें पोर्ट्रेट चोरी का कोई समाचार नही था. हाँ आर्ट गैलरी के पास हुए बम विस्फोट का समाचार ज़रूर था. समाचार पढ़ते हुए अचानक उसकी आँखों में चौंकने के लक्षण पैदा हुए.<br />...................<br />"इं. दिनेश स्पीकिंग!" रिसीवर उठाकर इं. दिनेश ने माउथपीस में कहा.<br />"अब तक तुम्हें पोर्ट्रेट चोरी की ख़बर मिल चुकी होगी." दूसरी ओर से कहा गया.<br />"ओह, तो तुम ही हो. इससे पहले भी तुम फोन कर चुके हो." इन. दिनेश ने गहरी साँस लेकर कहा.<br />"हाँ, मैं ने ही इससे पहले फोन किया था." उधर से कहा गया. इं. दिनेश जल्दी जल्दी पर्चे पर कुछ लिखने लगा. फिर वह पर्चा उसने पास खड़े सिपाही को पकड़ा दिया.<br />"लेकिन तुम कौन हो और क्या चाहते हो?"<br />"मैं कौन हूँ, ये बताना बेकार है. हाँ मैं ये बता सकता हूँ कि मैं क्या चाहता हूँ. बात ये है कि वो पोर्ट्रेट जिसकी कीमत विश्व बाज़ार में पाँच करोड़ डालर है, इस समय मेरे पास है."<br />"क्या बक रहे हो." तेज़ आवाज़ में कहा इं. दिनेश ने.<br />"मैं बकवास नही कर रहा हूँ, बल्कि ये बात पूरी तरह सच है कि पोर्ट्रेट मेरे पास है. और मैं इसका सौदा करने जा रहा हूँ."<br />........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-70154821906855793422008-06-07T04:38:00.000-07:002008-06-07T04:40:05.608-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 38"ये तो तै है कि जब तक पोर्ट्रेट कंट्रोल रूम की दृष्टि में था, उसके चोरी होने का प्रश्न ही नही उठता. इसका मतलब ये हुआ कि कुछ देर के लिए कंट्रोल रूम के ओपरेटरों की दृष्टि पोर्ट्रेट पर से ज़रूर हटी थी."<br />"लेकिन ऐसा कैसे सम्भव है? अगर पोर्ट्रेट कि निगरानी का काम केवल एक ओपेरेटर का होता तो ये माना जा सकता है कि हो सकता है उसकी आंख झपक गई हो. लेकिन यहाँ तो तीन ओपेरेटर एक साथ स्क्रीन पर ऑंखें गडाये पोर्ट्रेट को लगातार देख रहे थे."<br />"तुम ग़लत ढंग से सोच रहे हो इंसपेक्टर." आई जी ने कहा,"यहाँ बात एक या तीन की नही है. यदि केवल एक ओपेरेटर भी होता तो भी ये बात नही मानी जा सकती कि पोर्ट्रेट बदलने वाला व्यक्ति तभी ये काम करता जब ओपेरेटर स्क्रीन के सामने न होता....तुम अच्छी तरह विचार कर के बताओ कि क्या टी.वी. स्क्रीन कुछ देर के लिए खराब हुई थी? या कोई ऐसी दूसरी बात हुई थी जिससे ओपेरेटरों कि दृष्टि पोर्ट्रेट पर से हट गई हो?"<br />इन. दिनेश सोचने लगा. फिर उसकी आँखों में चमक आ गई, "आप सही कह रहे हैं सर. कुछ देर के लिए टी.वी. स्क्रीन पर से आर्ट गैलरी का दृश्य गायब हो गया था.हमारा विचार था कि टी.वी. में कोई खराबी पैदा हो गई है."<br />"ये खराबी कितनी देर रही?"<br />"मेरा विचार है कि लगभग दो तीन मिनट तक. हम लोग स्पेशल दस्ता आर्ट गैलरी भेजने ही वाले थे कि उसी समय टी. वी. ठीक हो गया और पोर्ट्रेट को अपनी जगह पर सही सलामत देखकर हमने इत्मीनान की साँस ली."<br />"ठीक है. ये पूरी तरह साफ हो गया कि पोर्ट्रेट उसी समय चोरी हुआ था. एक पेशेवर गिरोह के लिए दो मिनट में पोर्ट्रेट बदलना कोई मुश्किल काम नही है."<br />"लेकिन उस समय वहाँ पहरेदार भी तो थे. अगर वो कोई गिरोह था तो उनकी दृष्टि से बचकर अपना काम कैसे कर गया?" इं. दिनेश ने प्रश्न उठाया.<br />........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-51111401889620591142008-05-29T10:25:00.000-07:002008-05-29T10:26:30.251-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 37कंट्रोल रूम में खलबली मची थी.<br />और न केवल कंट्रोल रूम बल्कि पोर्ट्रेट से संबंधित सभी सरकारी विभागों के बड़े अफसर हतप्रभ थे. क्योंकि अब तक ये मालुम हो चुका था कि असली पोर्ट्रेट की चोरी हो चुकी है. और आर्ट गैलरी में रखा पोर्ट्रेट नकली है.<br />ये बात अभी केवल बड़े अधिकारियों तक सीमित रखी गई थी. क्योंकि ये ख़बर लीक होने का अर्थ था, पूरे विश्व में देश की बदनामी होना.<br />प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था के मुखिया आई. जी. राघवेन्द्र की आयु हालांकि पचास को पार कर रही थी, किंतु किसी भी दशा में वो चालीस से अधिक का नही लगता था. और ये उसके नियमित व्यायाम का कमाल था कि इस आयु में भी उसके शरीर की चुस्ती फुर्ती जवानों को भी मात करती थी.<br />इस समय वो इंसपेक्टर दिनेश के साथ अपने चैंबर में बैठा था. उसके मस्तक की लकीरें बता रही थीं कि या तो वो किसी सोच में डूबा है या चिंतित है. इं. दिनेश उसे पोर्ट्रेट चोरी का पूरा विवरण बता चुका था.<br />"तो इसका अर्थ हुआ कि अगर वो अज्ञात फोन न आता तो हम पोर्ट्रेट की चोरी से पूरी तरह बेखबर रहते. फिर या तो नकली पोर्ट्रेट इटली पहुँच जाता या फिर पब्लिक को हम से पहले इस चोरी का पता चल जाता." इं. दिनेश के चेहरे पर नज़रें गडाकर आई. जी. राघवेन्द्र ने कहा.<br />"लेकिन वो अज्ञात फोन किसका हो सकता है?" इं. दिनेश ने अपने आप से प्रश्न किया.<br />"मेरी दृष्टि में उस व्यक्ति के लिए तीन संभावनाएं हैं. एक तो ये कि वो आर्ट गैलरी का कोई जानकार दर्शक हो सकता है. जिसने असली और नकली पोर्ट्रेट का अन्तर मालुम कर लिया हो. फिर उसने हमें इन्फोर्म किया हो. दूसरी सम्भावना ये है कि फोन ख़ुद पोर्ट्रेट चुराने वाले ने किया हो और वह उसकी वापसी के लिए हमसे मामला करना चाहता हो.<br />और तीसरी बात ये हो सकती है कि पोर्ट्रेट चुराने का काम किसी गिरोह का हो और बाद में उस गिरोह का कोई व्यक्ति किसी कारणवश अलग होकर मुखबिरी करना चाहता हो." आई. जी ने अपनी बात पूरी की और मेज़ का पेपरवेट उँगलियों के बीच नचाने लगा.<br />"सही बात क्या है, ये तो हमें तभी मालुम हो सकेगा जब उसका दूसरा फोन आयेगा. जैसा कि उसने कहा है कि वो दूसरा फोन करेगा. " इं. दिनेश बोला.<br />"ठीक है. उसके फोन कि प्रतीक्षा करनी चाहिए. लेकिन साथ ही ये पता लगाना ज़रूरी है कि पोर्ट्रेट चोरी कैसे हुआ."<br />"इस बारे में आपका क्या विचार है?" इं. दिनेश ने पूछा.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-7954324954908037272008-05-27T04:15:00.000-07:002008-05-27T04:17:20.654-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 36मुसीबतचंद सकपका कर अपने को उस व्यक्ति के चंगुल से अलग करने लगा. उसने जब पीछे घूमकर देखा तो एक दुबले पतले सज्जन जिनका कद काफी लंबा था, उनसे लिपटे हुए थे.<br />"माफ कीजिये भाई साहब, मैं ने आपको पहचाना नही." उन्हें अपने से दूर धकेलकर मुसीबतचंद बोला.<br />"तोम हंसराज हो?" उसने ऊँगली से मुसीबतचंद की और संकेत किया.<br />"नहीं. मैं तो मुसीबतचंद हूँ. हंसराज तो मेरे सर पर सारी मुसीबतें छोड़कर भाग गया. किंतु आप कौन सी मुसी...मेरा मतलब कौन सज्जन हैं?" मुसीबतचंद पीछे हटते हुए बोला क्योंकि वे सज्जन आगे बढ़ आये थे. और उनके मुंह से आता शराब का भभका मुसीबतचंद के लिए असहनीय था.<br />"मैं सोनिया का चाचा हूँ. अगर तुम हंसराज नही हो तो बताओ हंसराज कहाँ है? क्योंकि कई लोगों ने मुझे बताया है कि सोनिया हंसराज के साथ गई है. अब अगर वो मिल गई तो मैं उसे गो गोली से मार दूँगा." नशे के कारण उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी.<br />"ओह, लेकिन तुमने उसे इतनी छूट क्यों दी कि वो हंसराज से मिलती जुलती रही और फिर उसके साथ चली गई." मुसीबतचंद ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा. सोनिया का चाचा उससे पहले ही कुर्सी पर ढेर हो चुका था.<br />मुसीबतचंद की बात सुनकर वह तैश में आ गया. "तुमसे क्या मतलब, मैं चाहे किसी को छूट दूँ चाहे पकड़ लूँ. कल से मैं शराब को तरस रहा हूँ. बड़ी मुश्किल से आज एक बोतल उधार मिली है. अब सोनिया मिले तो उससे लेकर पैसे चुकाऊं."<br />"ओह, तो सोनिया तुम्हारे लिए पैसे लाती है. किंतु वह कौन सा धंधा करती है?" मुसीबतचंद ने पूछा.<br />"पता नही अब कौन सा धंधा करती है. पहले तो वह दुकानदारों से मांग मांग कर लाती थी. उसकी अच्छी सूरत देखकर सब उसे कुछ न कुछ पकड़ा देते थे. लेकिन जब से जवान हुई है मुझे नही मालुम कहाँ से पैसे लाती है. और मुझे इन सब से क्या मतलब. मुझे तो बस दो वक्त की बोतल से मतलब है. हाँ तो तुम जल्दी बताओ कि सोनिया कहाँ है."<br />"देखिये मिस्टर!" मुसीबतचंद ऊंची आवाज़ में बोला, "मुझे नही मालुम कि हंसराज और सोनिया कहाँ गये हैं. और अब तुम भी चलते फिरते नज़र आओ. मुझे कुछ काम करना है."<br />"जा रहा हूँ....जा रहा हूँ. मैं ख़ुद ही पता कर लूंगा कि वे लोग कहाँ हैं." सोनिया का चाचा उठ खड़ा हुआ. उसके जाने के बाद मुसीबतचंद देर तक बड़बड़ाता रहा.<br />"साला, चाचा बनता है. इसको इतनी भी परवाह नही कि उसकी भतीजी क्या कर रही है. खैर मुझे क्या. मुझे तो अब चलने कि तय्यारी करनी चाहिए. वरना अगर मकान मालिक दुबारा आ गया तो मेरी खैर नही." वो जल्दी जल्दी अपना सामान समेटने लगा.<br />...........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-17528623339493143032008-05-24T08:55:00.000-07:002008-05-24T08:57:48.198-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 35"मैं मधुबन रेस्टोरेंट का मालिक हूँ. किंतु आप कौन महाशय हैं?" उसने गुददी सहलाते हुए कहा.<br />"मैं इस मकान का मालिक हूँ. जिसे तुम बेचने की बात कर रहे थे."<br />"क.. किंतु मैं ने सुना है कि यहाँ हंसराज रहता है." <br />"ठीक सुना है. वोह रहता है, लेकिन किराए पर. वो यहाँ किरायेदार है जबकि मैं मकान मालिक. और इस समय यहाँ उससे किराया वसूलने आया था. और अब तुम चलते फिरते नज़र आओ." उसने रेस्टोरेँट मालिक से कहा और वो बाहर जाने लगा. उसके पीछे मुसीबत्चंद ने भी बाहर जाना चाहा, किंतु मकान मालिक ने उसे रोक लिया.<br />"तुम कहाँ जा रहे हो? ये बताओ हंसराज कहाँ है? मुझे उससे तीन महीने का किराया वसूलना है.<br />"मुझे भी नही मालुम कि वो किधर गया है. मैं तो अभी अभी बाहर से आ रहा हूँ."मुसीबतचंद बोला.<br />"वो कमबख्त हमेशा कोई न कोई बहाना बनाकर किराया नही देता. अब मैं उसका सारा सामान उठाकर बाहर फिंकवा दूँगा." वो गुस्से में बड़बड़ा रहा था.<br />"लेकिन कौन सा सामान आप बाहर फिंकवाईयेगा? मकान तो पूरा खाली पड़ा है." मुसीबतचंद ने ध्यान दिलाया और मकान मालिक चौंक कर अपने घर का निरीक्षण करने लगा.<br />"आयें! सारा सामान कहाँ गया? कहीं ऐसा तो नही कि वो मेरा किराया लेकर चम्पत हो गया हो. तुम उसके दोस्त मालुम होते हो तुम्हें ज़रूर मालुम होगा कि वो कहाँ गया." मकान मालिक ने मुसीबतचंद की ओर घूम कर कहा.<br />"मैं आपसे बता चुका हूँ कि मैं बाहर से आ रहा हूँ. और वो इस बीच कब यहाँ से चला गया, मुझे कुछ पता नहीं." मुसीबतचंद ने समझाने के भाव में कहा.<br />"मैं कुछ नही जानता. कल शाम को मैं फिर यहाँ आऊंगा. तब तक हंसराज का पता मिल जाना चाहिए. वरना मैं तुम ही से तीन महीने का किराया पाँच हज़ार एक सौ रूपये वसूल लूंगा." कहते हुए मकान मालिक वहाँ से चला गया.<br />"मारे गये मुसीबतचंद. अब अच्छा यही है कि कल शाम से पहले तुम भी यहाँ से फूट लो वरना अच्छी हजामत बन जायेगी." वरना अच्छी हजामत बन जायेगी." उसने अपनी पोटली नीचे रखी और अपना हुलिया ठीक करने लगा. <br />तभी पीछे से किसी ने आकर उसे जकड लिया. "अरे भाई, तुम बहुत जालिम हो. तुम ने मेरी सोनिया को मुझ से छुड़ा दिया." आने वाले कि आवाज़ शराब में डूबी थी.<br />........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-29070807100179801122008-05-16T04:59:00.000-07:002008-05-16T05:11:10.997-07:00हिन्दी कॉमेडी ड्रामा - पानी कहाँ हो तुम !लेखक - जीशान जैदी<br />नोट - ड्रामा पढने के लिए टाइटल पर क्लीक करें तत्पश्चात पी.डी.एफ. डाउनलोड करें.zeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-34772630932352293272008-05-15T19:50:00.000-07:002008-05-15T19:52:01.766-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 34"क्या मतलब?" मुसीबतचंद के स्वर में विस्मय था.<br />"मतलब ये कि मैं एक रेस्टोरेंट चलाता हूँ. एक दिन वो आया और बातों ही बातों में कहने लगा कि वो साउथ इंडिया से आया है और मेरे दोस्त वासुदेवन का संदेश लाया है. मैं ने उस पर विश्वास कर लिया. क्योंकि वास्तव में साउथ इंडिया में वासुदेवन मेरा मित्र था. उसने कहा कि वासुदेवन तुम्हारे साथ पार्टनरशिप करके साउथ में एक डोसा रेस्टोरेंट खोलने का विचार रखता है. मैं खुश हो गया क्योंकि इस तरह मेरे बिजनेस का विस्तार हो जाता. उसने अग्रीमेंट पेपर दिखाया, जिस पर मेरे मित्र के सिग्नेचर थे. मैं ने भी उस पर साइन कर दिए और दो लाख रूपये अग्रीमेंट के अनुसार बैंक अकाउंट में डोसा रेस्टोरेंट के नाम से जमा कर दिए. उसके बाद वो चला गया.<br />जब कई दिनों तक वो दुबारा नहीं आया तो मैं ने छानबीन की. उस समय मालुम हुआ कि अकाउंट में जमा दो लाख रूपये गायब हैं. और फिर जब मैं ने वासुदेवन से सम्पर्क किया तो मालुम हुआ कि उसने किसी भी व्यक्ति के हाथों कोई अग्रीमेंट नही भेजा था.<br />मुसीबतचंद भौंचक्का होकर उस व्यक्ति की कहानी सुन रहा था. वो कह रहा था, "मैं ने बड़ी मुश्किल से ये पता लगाया कि वो व्यक्ति किशोर इस मकान में रहता है. और उसका असली नाम हंसराज है. अब मैं उसे नही छोडूंगा."<br />"छोड़ने कि बात तो तब होगी जब आप उसे पकड़ पायेंगे. मेरा विचार है कि वो घर छोड़कर कहीं और जा चुका है." मुसीबतचंद बोला.<br />"कोई बात नहीं. ये मकान तो है. मैं इसे बेच दूँगा. मेरा विचार है कि इस मकान के कम से कम दस लाख मिल जायेंगे."<br />अभी वो ये बात कर ही रहा था कि पीछे से एक ज़ोरदार घूँसा उसकी गुददी पर पड़ा. और वो अपनी झोंक में आगे बढ़ता चला गया. फिर जो उसने घूमकर देखा तो एक उससे भी तगड़ा व्यक्ति कमर पर हाथ रखकर उसे घूर रहा था.<br />"क्यों जी , मेरे होते हुए मेरा ही मकान बेचने का प्लान कर रहा है. कौन है बे तू?" उसने गुस्से से पूछा.<br />....continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-86116041244298273622008-05-11T04:38:00.000-07:002008-05-11T04:41:18.476-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 33फिर काफी देर परेशान होने के बाद जब चाकलेट का पाउच फटकर उसके मुंह में मिठास घोलने लगा तो उसकी समझ में आया कि वो बत्तीसी के बजाये कुछ और अपने मुंह में रख चुका था. <br />"तुम ठीक तो हो सोनिया?" हंसराज सोनिया से पूछ रहा था. सोनिया ने स्वीकारात्मक रूप में सर हिलाया और रूमाल निकालकर अपने चेहरे को साफ करने लगी. क्योंकि बत्तीसी के साथ साथ थूक की छीटें भी उसके चेहरे पर पड़ी थीं. उसकी नाक लाल हो गई थी.<br />बूढे ने नकली बत्तीसी अपने मुंह में फिट की और बोला, "अच्छा तो अब मैं चलता हूँ."<br />इन लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की किंतु वो फिर रूका नही. क्योंकि अपनी बत्तीसी के कारण वो बुरी तरह शर्मिंदा हो गया था.<br />"चला गया कमबख्त. कहता था कि अभी तो मैं जवान हूँ." सोनिया बड़बड़ाई.<br />"आसामी मालदार लगता है. उस पर हाथ साफ किया जा सकता है." हंसराज कुछ और सोच रहा था.<br />"पोर्ट्रेट पर हाथ साफ करने के बाद अब कहीं और सेंध लगाने की क्या आवश्यकता रह गई है?" सोनिया बोली.<br />"धीरे बोलो. दीवारों के भी कान होते हैं. पोर्ट्रेट का मूल्य मिलने में हमें अभी देर लगेगी. तब तक काम चलने के लिए कहीं से इन्तिजाम करना ही पड़ेगा."<br />"क्या उसका कोई खरीदार मिला?" <br />"मैं ने तुमसे कहा न कि उसका खरीदार पहले से तै है. और वो हमें मुंह मांगी कीमत देगा."<br />" कौन है वो खरीदार?" सोनिया ने उत्सुकता से पूछा."<br />.......................<br />मुसीबतचंद ने आश्चर्य से घर को देखा. क्योंकि वहाँ पूरी तरह सन्नाटा छाया था. <br />वो अभी अभी थाने से घर पहुँचा था और ज्योतिषी कि वेशभूषा में था.<br />"कमाल है, कहाँ गये ये लोग? घर पर तो ऐसा सन्नाटा छाया है जैसे करफयू लग गया हो."<br />वो इधर उधर टहलने लगा. तभी किसी ने पीछे से उसका कालर पकड़ लिया और वो हडबडा कर पीछे हटा.<br />पीछे एक मोटा तगड़ा व्यक्ति खड़ा लाल लाल आँखों से उसे घूर रहा था. किंतु जब उसने मुसीबतचंद का चेहरा देखा तो तुरंत कालर छोड़ दिया.<br />"कौन हो तुम? हंसराज कहाँ है?" उस व्यक्ति ने पूछा.<br />"पता नही. मैं भी उसे ढूँढ रहा हूँ." मुसीबतचंद ने जवाब दिया.<br />"क्यों? क्या उसने तुम्हें भी चोट दी है?" उस व्यक्ति ने पूछा.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-38645395027069410792008-05-05T18:38:00.000-07:002008-05-05T18:39:27.006-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 32"चीख क्यों रहे हैं? अगर इतना ही चाकलेट खाने का शौक है तो हम अपनी चाकलेट आपको दिए दे रहे हैं. सोनिया मैं तुम्हें दूसरी चाकलेट बाज़ार से खरीद दूँगा, ये चाकलेट श्रीमान जी को दे दो." सोनिया को संबोधित करते हुए हंसराज ने एक आंख दबाई.<br />"अरे वाह, मैं क्यों अपनी चाकलेट दूँ. अंकल, आप अपने लिए चाकलेट बाज़ार से खरीद लें." सोनिया ने बूढे को संबोधित किया और बूढा एकदम से ढीला पड़ गया.<br />"ठीक है मिस, मैं दूसरी चाकलेट ले लूंगा. किंतु मेरा विचार है कि मैं इतना बूढा भी नही हूँ कि आप मुझे अंकल कहिये." उसने सोनिया की तरफ मुस्कुराकर देखा और हंसराज अपना सर सहलाने लगा.<br />"आप खड़े क्यों हैं. बैठिये." सोनिया ने कहा और बूढा वहाँ रखी तीसरी कुर्सी पर बैठ गया.<br />"बाई दा वे, मुझे लोग सेठ धीरुमल कहते हैं. क्या मैं आपका शुभ नाम जान सकता हूँ?" बूढा अब लगातार सोनिया की ओर देख रहा था. हंसराज की ओर उसने एक बार भी नही देखा जो 'सेठ' शब्द सुनकर चौंक पड़ा था.<br />"मेरा नाम स..सीमा है." सही नाम बताने से पहले ही हंसराज ने सोनिया के पाँव पर अपना पाँव रख दिया. अतः सोनिया ने तुरंत अपना नाम बदल दिया.<br />"सीमा अच्छा नाम है. लगता है जैसे हर ओर फूलों की सुगंध फैल रही है." बूढा अब बहकने लगा था. सोनिया ने हंसराज की ओर देखा जिसके होंटों पर हलकी मुस्कराहट थी.<br />हंसराज ने सोनिया को इशारा किया और सोनिया ने पूछा, "सेठ जी, आपका कारोबार क्या है?"<br />"लगता है आप इस शहर में पहली बार आए हैं. सेठ धीरुमल को तो यहाँ का बच्चा बच्चा जनता है. यहाँ की सबसे मशहूर हलवाई की दूकान सेठ धीरुमल की है." उसने अकड़ कर कहा.<br />"ओह, तभी आपको मिठाइयाँ और चाकलेट बहुत पसंद हैं?" सोनिया बोली.<br />"हा..हा..हिप." कहकहा लगते हुए सेठ ने जल्दी से अपने मुंह पर हाथ रखा किंतु उससे पहले ही उसकी नकली बत्तीसी खुले मुंह से बाहर आई और सोनिया की नाक से किसी बुलेट की तरह टकरा गई.<br />सोनिया अपनी नाक पकड़कर झुक गई. हंसराज जल्दी से उठकर उसके पास पहुँचा और उसकी नाक सहलाने लगा. जबकि सेठ एकदम से शर्मिंदा हो गया था.<br />"माफ कीजियेगा. मैं भूल गया था की मेरी बत्तीसी नकली है." बौखलाहट में वो बत्तीसी के बजाये वहाँ रखा चाकलेट का पाउच अपने मुंह में लगाने लगा.<br />......continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-79295436257619082712008-05-03T18:42:00.000-07:002008-05-03T18:45:49.913-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 31"व्हाट!" इंसपेक्टर ने तेज़ आवाज़ में कहा, "कौन हो तुम और क्या बकवास कर रहे <br />हो." <br />"ये बकवास नही है. आप इसकी जांच करवा लें. मैं उसके बाद फिर फोन करूँगा." कहने <br />के साथ ही रिसीवर रख दिया गया. <br />इंसपेक्टर दिनेश ने रिसीवर रखा और तुरंत बाहर निकल गया. <br />.................... <br />एक होटल के रिसेप्शन हाल में हंसराज और सोनिया इस समय मौजूद थे. हंसराज ध्यान <br />से उस बूढे को देख रहा था जो अब तक दो तीन चाकलेट के पैकेट अपनी जेब से निकलकर <br />चट कर चुका था. <br />"उधर गौर से क्या देख रहे हो." सोनिया ने हंसराज के चेहरे के सामने हाथ हिलाया. <br />इस समय वो भूरे रंग की साड़ी पहने थी जबकि हंसराज नीले रंग के थ्री पीस सूट में <br />था. <br />"मैं ये देख रहा हूँ कि वह बूढा होकर चाकलेट खा रहा है जबकि हम जवान होकर टाफी भी नही खा रहे हैं." <br />"तुम भी चाकलेट खरीद लाओ." <br />"ओ. के. तुम यहीं बैठो. मैं अभी आता हूँ." कहते हुए हंसराज उठा और उस दिशा में बढ़ने लगा जिधर बूढे की मेज़ थी. मेज़ के पास पहुंचकर वो इस प्रकार लड़खड़ाया मानो किसी चीज़ से ठोकर लगी है. किंतु तुरंत वो कुर्सी पकड़कर संभला और फिर आगे बढ़ गया. वहाँ से वापस वो अपनी मेज़ पर आ गया. <br />"क्या हुआ ? वापस क्यों आ गये?" सोनिया ने पूछा. <br />हंसराज ने अपनी जेब से चाकलेट के तीन चार पैकेट निकाल कर सोनिया के सामने रख दिए और तेज़ आवाज़ में बोला,"लो चाकलेट खाओ. जब बूढे चाकलेट खा सकते हैं तो हम लोग क्यों नहीं." <br />हंसराज का स्वर बूढे के कानों तक पहुँच चुका था. अतः वह चौंक कर इन्हें घूरने लगा. फिर जैसे ही उसने नया पैकेट निकलने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला, उसका चेहरा लाल हो गया और वह उठकर तीर की तरह इनकी मेज़ पर आया. <br />"तुमने मेरी जेब से चाकलेट निकाली है?" उसने तेज़ आवाज़ में पूछा. <br />"भला मैं क्यों तुम्हारी जेब से चाकलेट निकालने लगा. अपनी चाकलेट तुमने ख़ुद खाई होगी." हंसराज बोला. <br />"मैं कहता हूँ मेरी चाकलेट वापस करो." बूढा दहाड़ा और आसपास बैठे लोग चौंक कर उनकी ओर देखने लगे.<br />......continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-59116726566201551632008-04-29T18:12:00.000-07:002008-04-29T18:14:48.254-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 30उसने फोन उठाया और फिर दूसरी तरफ़ की आवाज़ सुनते ही वो सावधान की मुद्रा में आ गया.<br />"क्या रहा?" दूसरी ओर से पूछा गया.<br />"काम हो गया बास. पोर्ट्रेट इस समय मेरे पास मौजूद है." वह बोला.<br />"गुड. अब ध्यान से सुनो. मि. एडगर कुछ ही देर में तुम्हारे पास पहुँचने वाले हैं. उनके साथ कलाकृतियों का एक एक्सपर्ट भी होगा, जो उस पोर्ट्रेट को चेक करेगा. उसकी संतुष्टि के बाद तुम मि. एडगर से ब्रीफकेस ले लेना जिसमें दस लाख डॉलर के नोट होंगे. उन्हें गिनने के बाद पोर्ट्रेट मि. एडगर को दे देना."<br />"ऐसा ही होगा बास. एक बात और आप से कहनी है."<br />"क्या बात है? उधर से पूछा गया.<br />"ये गंगाराम अपने पर फैलाने की कोशिश कर रहा है. क्या उसे ठिकाने लगा दिया जाये?"<br />"अभी उसे रहने दो. वक्त आने पर उसका इन्तिजाम हो जाएगा." कहने के साथ ही दूसरी ओर से कनेक्शन काट दिया गया.<br />......................<br />ये कंट्रोल रूम था.<br />जिसका सीधा सम्पर्क टी.वी. द्वारा आर्ट गैलरी से था. और यहाँ तीन ऑपरेटरों को केवल इसलिए रखा गया था कि वे हर पल लेओनार्दो के पोर्ट्रेट पर दृष्टि रखें.<br />इसके अलावा किसी भी इमर्जेंसी से निपटने के लिए बीस कमांडो की रैपिड एक्शन फोर्स वहाँ तैनात थी.<br />इस समय दो ओप्रेटर टी.वी. के सामने बैठे आर्ट गैलरी की हलचलों को देख रहे थे.<br />उसी समय वहाँ रखे फोन की घंटी घनघनाने लगी. वहाँ उपस्थित इं. दिनेश ने फोन उठाया.<br />"हेलो." वो बोला.<br />"क्या ये आर्ट गैलरी का कंट्रोल रूम है?" दूसरी ओर से पूछा गया.<br />"जी हाँ. आप कौन हैं?"<br />"मेरे बारे में जानना आपके लिए बेकार है. फिलहाल आप मेरी सूचना ध्यान से सुनें. वो ये है की आर्ट गैलरी में रखा पोर्ट्रेट नकली है. असली चोरी हो चुका है."<br />......continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-88676431420115462592008-04-24T20:27:00.001-07:002008-04-24T20:28:10.020-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 29"तुम सभी का काम काफी बढ़िया रहा." पोर्ट्रेट को अलमारी में रखने के पश्चात मनोहरश्याम बोला.<br />"ठीक समय पर बम फटा. रोशन भी कैमरे का कनेक्शन सही समय पर काटने में कामयाब हो गया.सौम्य अपना काम दिए गये समय के अंदर करने में कामयाब हो गया. अब यहाँ की सरकार सर पीटेगी जब उसे पता चलेगा कि म्यूज़ियम का असली पोर्ट्रेट गायब हो गया."<br />"वो विदेशी ग्राहक कौन है जो इस पोर्ट्रेट को खरीदना चाहता है?" सौम्य ने पूछा.<br />"संभवत वो यू.एस.ए. का है. किंतु ये मेरा केवल अनुमान है. नाम है माइक एडगर. वो इटली से इसका पीछा कर रहा था. यहाँ उसने इसे चुराने का मुझसे सौदा किया."<br />"वह इस पोर्ट्रेट को बाहर कैसे ले जाएगा? क्योंकि अब तक सरकार को पता लग चुका होगा की म्यूज़ियम में रखा पोर्ट्रेट नकली है. अब हर तरफ़ जांच चल रही होगी." रोशन बोला.<br />"इससे हमें कोई मतलब नही होना चाहिए. कुछ ही देर में वह आता होगा. हमें उससे रकम लेकर ये पोर्ट्रेट दे देना है. फिर हमारा काम समाप्त हो जाएगा. तुम लोग अब जाओ. तुम्हारा मेहनताना पचास पचास हज़ार रुपये दो तीन घंटों बाद तुम लोगों को मिल जायेंगे."<br />"वो विदेशी इस पोट्रेट के लिए कितनी रकम दे रहा है?" गंगाराम ने पूछा.<br />"मेरा विचार है कि इससे तुम्हें कोई मतलब नही होना चाहिए." मनोहरश्याम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा.<br />"मतलब तो है. क्योंकि इसी से हम पता करेंगे कि हमें मिलने वाला मेहनताना कम है या ठीक है." गंगाराम ने कुर्सी से पीठ टिकाते हुए कहा.<br />"अगर मेहनताना कम भी है तब भी तुम्हें गुज़ारा करना पड़ेगा. क्योंकि तुम लोगों को हर महीने बीस बीस हज़ार रूपये वेतन के रूप में इन्ही कामों के लिए मिलते हैं. और ये रकम उसके अलावा है.अब तुम लोग जा सकते हो." मनोहरश्याम ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.<br />फिर कोई कुछ नही बोला और वे लोग चुपचाप उठकर बाहर निकल गये.<br />उनके जाने के बाद वो अपने विचारों में लीन हो गया. उसकी तंद्रा उस समय भंग हुई जब पास रखे फोन की घंटी बजी.<br />........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-75456928153538722212008-04-21T04:57:00.000-07:002008-04-21T04:58:21.524-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 28"मेरी तरक्की कब होगी?"<br />मुसीबतचंद अब एक कुर्सी पर बैठ गया. किसी ने कोई आपत्ति नही की.<br />अब मुसीबतचंद इंसपेक्टर का हाथ देख रहा था. कुछ देर गौर से देखने के बाद बोला, "तुम्हारी तरक्की की राह में एक रुकावट पड़ रही है."<br />"कैसी रुकावट?"<br />"मैं इसके बारे में स्पष्ट नही समझ पा रहा हूँ. किंतु उसका डील डौल भरी भरकम है."<br />"ओह, मुझे पहले ही शक था की मेरी तरक्की में एस पी राम किशोर रोड़े अटका रहा है. अब मैं उस से समझ लूंगा. मेरी पहुँच भी बहुत ऊपर तक है. ऐसी जगह ट्रान्सफर कराऊंगा की हमेशा याद रखेगा."<br />"लेकिन वो ऐसा क्यों कर रहा है?" एक सिपाही ने पूछा.<br />"एक बार बदमाशों की आपसी लड़ाई में एक इनामी बदमाश मारा गया था. राम किशोर ने उसको मारने का क्रेडिट स्वयं लेना चाहा, किंतु उससे पहले ही मैं ने बदमाश की लाश के साथ फोटो खिंचवा लिया. अखबारों ने पुलिस मुठभेड़ में उसको मारने का क्रेडिट मुझे दे दिया. तभी से वो मुझसे खार खाता है."<br />"फिर तो उसका कोई उपाय सोचना पड़ेगा." वही सिपाही बोला.<br />"उपाए क्या सोचना है. बस ये बात ऊपर तक पहुँचा देनी है कि शहर में जो जुर्म बढ़ रहे हैं, उसके पीछे एस पी की नाकामी है. बस तुरंत उसका ट्रान्सफर हो जायेगा."<br />"आपका विचार सही है. अब देखिये, उसी के कारण एक बम काण्ड भी शहर में हो गया." दूसरा सिपाही बोला.<br />"ओह, बम काण्ड के बारे में मैं तो भूल ही गया था." इंसपेक्टर ने चौंक कर कहा.<br />"फिर इसका क्या करें?" उस सिपाही ने मुसीबतचंद की और संकेत किया, जिसने उसे पकड़कर गाड़ी में डाला था.<br />"थोड़ा अकल से काम लिया करो मेवालाल." इंसपेक्टर ने सिपाही को घूरा, "भला ये ज्योतिषी महाराज इस प्रकार के कार्य कहाँ करेंगे. आगे से किसी भी जुर्म में फंसाने के लिए ऐसे व्यक्ति को पकड़ना जो बेकार हो."<br />"गलती हो गई जी." सिपाही सर झुकाकर बोला.<br />"अच्छा तो ठीक है. ज्योतिषी जी, अब आप अपने घर जाइए. और ऊपर वाले से प्रार्थना कीजिये कि मैं राम किशोर को सबक सिखाने में सफल हो जाऊं." इंस्पेक्टर मुसीबतचंद से बोला.<br />इस तरह मुसीबतचंद को वहाँ से छुटकारा मिल गया.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-7227945884212688052008-04-12T21:19:00.000-07:002008-04-13T00:08:05.244-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 27"मुसीबतचंद का क्या हुआ?" सोनिया ने पूछा.<br />"उसे सामने फुटपाथ पर बिठा दिया था. वो वहीं होगा. उसकी चिंता छोड़ो, वो अपने आप घर आ जाएगा."<br />"पोर्ट्रेट चुराने में कोई परेशानी तो नही हुई?"<br />"किस्मत अच्छी थी जो ये हमें मिल गया. वरना कोई और इसे ले उड़ा था. मौका मिलते ही मैं ने इसे उनके पास से पार कर दिया."<br />"ओह, कौन हो सकते हैं वो लोग?"<br />"पता नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है की दूसरी इमारत में बम का धमाका उनहोंने ही किया होगा. ताकि लोग उधर आकृष्ट हो जाएं और वे आराम से अपना काम कर सकें."<br />"तो अब तुम्हारा क्या इरादा है?" सोनिया ने पूछा.<br />"अब हमें जल्द से जल्द ये शहर कुछ दिनों के लिए छोड़ देना है. क्योंकि जल्दी ही कलाकृति चोरी होने का पता चल जायेगा. तब शायद हम लोगों के लिए यहाँ कलाकृति रखना असंभव हो जाएगा. इसके अलावा हमें जल्द से जल्द कोई ग्राहक भी ढूँढना होगा."<br />"ग्राहक ढूँढना तो बहुत मुश्किल होगा. क्योंकि हम इस बारे में पूरी तरह अनजान हैं कि इस तरह का सौदा कहाँ करना चाहिए. अगर हमारे पास पोर्ट्रेट होने कि बात फैल गई तो हमें जान के लाले पड़ जायेंगे. इसके अलावा ग्राहक को ये भी सिद्ध करना होगा कि ये पोर्ट्रेट असली है."<br />"मुझे भी इन कठिनाइयों का आभास है. किंतु मेरा विचार है कि मैं ने एक अच्छा ग्राहक ढूँढ लिया है."<br />"कौन है वो?" सोनिया ने उत्सुकता से पूछा.<br />"इसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा. फिलहाल तो जल्दी से घर पहुंचकर शहर से बाहर निकलने कि तैयारी करो." हंसराज बोला.<br />फिर बाकी का रास्ता खामोशी से तै हुआ.<br />................<br />"हाँ तो अब बताओ कौन हो तुम." थाने में पहुँचने के बाद इंसपेक्टर ने डपटकर मुसीबतचंद से पूछा.<br />"एक मिनट सर." वो सिपाही बोला जिसका मुसीबतचंद ने भविष्य बताया था. उसने धीरे से इंसपेक्टर के कान में कुछ कहा और इंसपेक्टर की त्योरियां ढीली पड़ गईं. <br />"ओह, तो तुम ज्योतिषी हो." उसने नर्म लहजे में कहा.<br />"जी हाँ हुज़ूर. मेरी भविष्यवाणियाँ शत प्रतिशत सही निकलती हैं."<br />"तो कुछ मेरे बारे में भी बताओ." इंसपेक्टर ने अपना हाथ आगे बढाया.<br />......continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-70893424898637341242008-04-10T20:10:00.000-07:002008-04-10T20:12:11.216-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 26मुसीबतचंद ने गौर से सिपाहियों को देखा फिर चौंक कर एक सिपाही से बोला,"दीवान जी , अपना हाथ बढ़ाईये."<br />"क्यों?" त्योरियां चढाकर सिपाही बोला.<br />"मैं आपके मस्तक पर सौभाग्य के चिन्ह देख रहा हूँ. हाथ देखकर मैं इसकी सत्यता देखना चाहता हूँ." मुसीबतचंद ने सिपाही का हाथ अपने हाथ में लिया और गौर से लकीरें देखने लगा.<br />"मेरा अनुमान सही निकला. जल्दी ही तुम्हारी तरक्की होगी और तुम इंसपेक्टर बना दिए जाओगे." मुसीबतचंद ने खुशखबरी सुनाई.<br />"क्या सच!" सिपाही की ऑंखें फैल गईं, "तुम्हें कैसे पता चला?"<br />"मुझे ज्योतिषाचार्य मुसीबतचंद के नाम से जाना जाता है. अमिताभ बच्चन के सुपरस्टार बनने की भविष्यवाणी मैं ने ही की थी. मैं ने ही भविष्यवाणी की थी कि बीसवीं शताब्दी में तृतीय विश्व युद्ध नही होगा."<br />"तुम तो एक महान ज्योतिषी हो. यदि तुम्हारी भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो गई तो मैं राम खिलावन को तुरंत हवालात में डलवा दूँगा. साला कभी अपनी टैक्सी का टैक्स नही देता."<br />"तो अभी उसे क्यों नही हवालात में डलवा देते?" मुसीबतचंद ने पूछा.<br />"अभी तो सब इंसपेक्टर उसका बचाओ कर देता है. वो राम खिलावन का ममेरा भाई है."<br />"तो फिर ठीक है. इंसपेक्टर बनते ही तुम अपने सारे दुश्मनों कि खाट खड़ी कर देना."<br />अब तक पुलिस वहां कि कार्यवाई पूरी कर चुकी थी और वे लोग गाड़ियों में बैठने लगे थे. फिर गाडियाँ थाने के लिए प्रस्थान कर गईं.<br />................<br />हंसराज उस पेड़ के पास आया जहाँ सोनिया खड़ी थी.<br />"क्या हुआ?" उसने आतुरता से पूछा.<br />"सफलता." हंसराज ने जवाब दिया.<br />"तो अब जल्दी से निकल चुको. क्योंकि पुलिस चारों ओर लोगों की तलाशी ले रही है."<br />"क्यों? क्या पोर्ट्रेट चोरी की बात पता चल गई है?" हंसराज ने चैंक कर पूछा.<br />"नहीं. यहाँ एक इमारत में बम फटा है. उसी की छानबीन करने पुलिस आई है."<br />"ओह, फिर तो हमें सावधानी से यहाँ से निकलना होगा." हंसराज ने सोनिया का हाथ पकड़ा और वे लोग धीरे धीरे उस इलाके से दूर जाने लगे.<br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-63215830014840634432008-04-04T09:21:00.000-07:002008-04-04T09:22:32.122-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 25बैग वाला व्यक्ति जो वास्तव में सौम्य था, तेज़ी से बाहर निकला. और ताला खोलने वाले व्यक्ति ने पुनः ताला लगा दिया. फिर वे लोग तेज़ी से बाहर निकले, किंतु इससे भी अधिक तेज़ी से हंसराज अपने पहले वाले स्थान पर पहुँच चुका था. <br />"लो बेटे हंसराज, तुम्हारा माल तो ये लोग ले उडे. अब तुम क्या करोगे." अपने मन में बड़बड़ाता हुआ वो उन लोगों को देखने लगा जो अब कमरे का दरवाज़ा बंद कर रहे थे. <br />फिर उसने उन लोगों का पीछा करने का निश्चय किया. और जैसे ही वे लोग कुछ दूर पर पहुंचे, वो उनके पीछे लग गया. <br />उधर सौम्य अपने साथियों से कह रहा था,"तुम लोग सामने के दरवाज़े से बाहर निकलो जबकि मैं पीछे पानी के पाइप के सहारे बाहर निकलूंगा. क्योंकि हो सकता है बाहर पहरेदार आ गये हों. इस दशा में तुम उन्हें रोक सकते हो." <br />"ओ.के. मि. सौम्य." दोनों ने एक साथ कहा और सौम्य उनका साथ छोड़कर दूसरी ओर मुड़ गया. <br />हंसराज ने सौम्य का पीछा करने का निश्चय किया. क्योंकि कलाकृति उसी के पास थी. अब उसके लिए कलाकृति उडाने का अधिक अवसर मिलने की सम्भावना थी. <br />कुछ देर बाद सौम्य छत पर था. उसे अभी तक आभास नही मिल पाया था कि उसके पीछे कोई है. <br />फिर हंसराज को अवसर मिल गया.कंधे से बैग उतरकर सौम्य ने अपने पीछे रखा और जूते के तस्मे खोलने लगा. हंसराज ने बैग पर हाथ डाल दिया. कुछ ही पलों में असली कलाकृति उसके बैग में पहुँच चुकी थी जबकि नकली सौम्य के बैग में. <br />जूते अपनी जेबों में ठूसने के बाद सौम्य ने बैग अपने कंधे पर डाला और उसी पाइप के सहारे नीचे उतरने लगा जिससे हंसराज ऊपर आया था. <br />कुछ देर बाद सौम्य नीचे झाड़ियों में गुम हो चुका था. हंसराज कुछ देर छत पर बैठा रहा फिर वो भी नीचे उतरने लगा. <br />दूर से पुलिस गाड़ियों के हार्न की आवाजें आ रही थीं. जो शायद बम से प्रभावित इमारत के निरीक्षण के लिए आई थी. <br />................... <br />"तू कौन है बे." एक पुलिसवाले ने मुसीबतचंद के सामने डंडा पटका और मुसीबतचंद उछ्ल गया. <br />"जे..जी, मैं मुसीबतचंद हूँ. ज्योतिषी. क्या आप अपना भविष्य जानना चाहते हैं? हाथ आगे बढाइये. भगवान कसम आपसे एक पैसा भी नही लूंगा." एक ही साँस में वो बोल गया. <br />"क्या बात है?" उन्हें बातें करता देखकर एक इंस्पेक्टर उनकी तरफ़ घूम गया. बम प्रभावित इमारत का मलबा हटाने और बचाव कार्य के लिए फायर ब्रिगेड की गाडियां वहाँ पहुँच चुकी थीं. और साथ ही साथ पुलिस की गाडियाँ भी. अब पुलिस घटना स्थल के निरीक्षण के बाद आसपास के लोगों से पूछताछ कर रही थी. <br />"ये आदमी मुझे संदिग्ध लग रहा है. अपने को ज्योतिषी बताता है." सिपाही बोला. <br />"ठीक है. इसे गाड़ी में डाल दो." इंस्पेक्टर ने मुसीबतचंद को घूरते हुए कहा. <br />"क..क्यों माई बाप. मैं ने तो कोई अपराध नही किया." मुसीबतचंद हकला गया. <br />"चुप रहो. तुम्हारा अपराध तो हवालात में पता चलेगा. चलो मेरे साथ." सिपाही ने मुसीबतचंद की बांह पकड़ी और गाड़ी की ओर ले जाने लगा. <br />गाड़ी के पास पहुंचकर उसने मुसीबत्चंद को अन्दर किया और वहाँ उपस्थित सिपाहियों से बोला, इसका ध्यान रखना. कहीं भागने न पाए. बहुत खतरनाक मुजरिम है. <br />"क्या इसी ने बम रखा था?" एक ने पूछा. <br />"ये पता तो तब चलेगा जब ये हवालात में मुंह खोलेगा." सिपाही मुसीबतचंद को पहुंचकर चला गया और वहाँ उपस्थित दोनों सिपाही उसे घूरने लगे. <br />.........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-73454040669732306842008-03-29T20:34:00.000-07:002008-03-29T20:35:38.056-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 24लोग भौंचक्के होकर उधर देखने लगे थे. फिर लोगों को होश आया और मलबे में दबे लोगों को निकलने के लिए वे चारों ओर से दौड़ पड़े. इन लोगों में आर्ट गैलरी के पहरेदार भी थे.<br />किंतु किसी ने ये ध्यान नही दिया कि तीन व्यक्ति दबे पाँव लोगों की नज़रों से बचते हुए आर्ट गैलरी की ओर बढ़ रहे थे.<br /> ......................<br />वह पाइप हंसराज के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ जो छत्त के पानी की निकासी के लिए लगा था. जूते अपनी जेबों में ठूसकर वो फुर्ती से उसी के सहारे ऊपर चढ़ने लगा. इस ओर अपेक्षाकृत अँधेरा था और काले कपडों ने उसके देख लिए जाने की सम्भावना को और कम कर दिया था. पीठ पर एक काले चमड़े का बैग था जो पहने हुए कपडों से समानता प्रकट कर रहा था. कुछ देर में वो छत पर था. फिर वहां से आर्ट गैलरी के अन्दर पहुँचना उसके लिए कुछ कठिन न था. जैसे ही वो नीचे पहुँचा, उसे एक ज़ोरदार धमाका सुनाई दिया. वो चौंका, लेकिन आगे बढ़ता रहा. अब वो सावधानी से उस कमरे की तरफ़ बढ़ रहा था जहाँ लेओनार्दो की कलाकृति रखी थी. उसे यहाँ पहरेदारों की उपस्थिति की आशा थी. किंतु यहाँ पूरी तरह सन्नाटा देखकर उसे आश्चर्य हुआ.<br />जल्दी ही वह प्रयोजनीय कमरे के सामने पहुँच गया. किंतु उसी समय उसे दूसरी ओर से कुछ आहट सुनाई पड़ी और वो जल्दी से बगल के कमरे में छुपने के लिए घुस गया. उसी समय तीन व्यक्ति कमरे के सामने आकर रुके. ये सौम्य का ग्रुप था. तीनों पूरी तरह चौकन्ने दिखाई पड़ रहे थे. हंसराज दरवाज़े की झिर्री से उनकी कारवाई देखने लगा.<br />उन्होंने कमरे के द्वार पर लगा ताला देखा, फिर उनमें से एक ने जेब से मुडा तार निकालकर ताले के कीहोल में लगा दिया. खट की हलकी आवाज़ हुई और ताला तुरंत खुल गया. दरवाज़ा खोलकर वे लोग अन्दर घुस गये.<br />हंसराज उनकी कारवाई देखने के लिए कमरे से बाहर आ गया और कलाकृति वाले कमरे के बगल में खड़े होकर उन्हें देखने लगा. उनमें से वही व्यक्ति अब लोहे के कटघरे का ताला खोल रहा था जिसने बाहर का ताला खोला था. वह व्यक्ति इस काम का एक्सपर्ट मालुम होता था क्योंकि कटघरे का ताला भी तुरंत खुल गया.<br />दूसरा व्यक्ति, जिसकी पीठ पर एक बैग था, आगे बढ़ा और उसने अपने बैग से हूबहू लेओनार्दो की कलाकृति जैसा चित्र निकालकर लेओनार्दो की कलाकृति के स्थान पर रख दिया और वह कलाकृति उसने अपने बैग में रख ली.<br />"साढ़े ग्यारह मिनट." तीसरा व्यक्ति धीमे स्वर में फुसफुसाया.<br />.................<em>अगले सिल्वर जुबली एपिसोड में पढ़ें, एक ट्विस्ट</em>..........continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-38420933045374465952008-03-26T04:10:00.000-07:002008-03-26T04:11:09.555-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 23"हम वादा करित है कि भैंस मिलै पर हम तुहें एक बाल्टी खालिस दूध दे जैबे." कहते हुए वो एक फर्राटे में दूर निकल गया.<br />"साला चला गया. अब तक किसी को बिना पानी का दूध दिया है या मुझे ही देगा." मुसीबतचंद बड़बड़ा रहा था.<br />"दूधवाले के जाने के बाद एक दूसरा गाहक मुसीबतचंद के सामने मौजूद था बल्कि थी. वो जींस टी-शर्ट और पर कटे बालों वाली एक लड़की थी जिसकी उम्र उन्नीस बीस के लगभग थी.<br />"मि. ज्योतिषी, मेरा हाथ देखकर बताइये कि मेरा भविष्य क्या है?" उसने अपना हाथ बढाया.<br />मुसीबतचंद ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और दूसरे हाथ से अपना चश्मा ठीक करने के उपरांत गौर से उसके हाथ की लकीरें देखने लगा."तुम्हारे हाथ की लकीरें बता रही हैं कि बिना किसी रुकावट के तुम्हारी शादी उसी से होगी जिससे तुम प्रेम करती हो." हाथ देखने के बाद उसने खुशखबरी सुनाई.<br />"व्हाट! क्या कहते हो." लड़की के माथे पर बल पड़ गए.<br />"अगर मुझे सुधीर से शादी करनी होती तो मैं उससे प्रेम ही क्यों करती. तुम मुझे ये बताओ कि मैं मिस इंडिया बन पाउंगी या नही?"<br />"उसके बारे में भी बताऊंगा. लेकिन पहले मेरी दक्षिणा पाँच रूपये दीजिये." मुसीबत्चंद को डर हुआ कि कहीं ये भी ग्राहक बिना पैसे दिए न निकल जाए.<br />"ये लो दस रूपये रखो. और जल्दी बताओ." तेज़ आवाज़ में बोलते हुए उसने पर्स से दस का नोट निकालकर मुसीबतचंद की तरफ़ फ़ेंक दिया.<br />"दस रूपये में तो आप मिस यूनिवर्स भी बन जायेंगी." लाइये फिर हाथ दिखाइये."<br />लड़की ने हाथ आगे बढाया. किन्तु उसी समय पास की इमारत में एक जोरदार धमाका हुआ. देखते ही देखते इमारत का एक भाग मलबे में बदल गया.<br />.......continuedzeashan zaidihttp://www.blogger.com/profile/16283045525932472056noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3731681323285689206.post-57145359347283651362008-03-23T04:40:00.000-07:002008-03-24T04:34:12.020-07:00चार सौ बीस - एपिसोड 22मुसीबतचंद अपने ताम झाम के साथ आर्ट गैलरी के सामने फुटपाथ पर पसरा हुआ था. माथे पर तिलक, गेरुआ वस्त्र व पगड़ी में वह पूरी तरह से ज्योतिषी बना हुआ था. परिचय की थोडी बहुत कमी सामने रखे उस बोर्ड ने पूरी कर दी थी जिसपर एक हाथ अपनी पूरी लकीरों के साथ विराजमान था.<br />बड़ी कठिनाइयों के बाद हंसराज ने उसे ये कहकर तैयार किया था कि शहर में किसी को खाली समय नही बिताना चाहिए. अगर उसके पास ज्योतिष विद्या है तो उसे इसका प्रदर्शन करना चाहिए.<br />किंतु मुसीबतचंद को उसके स्थान पर पहुँचाने के बाद हंसराज ने नकली पोर्ट्रेट उसके पास नही रखा. क्योंकि उसने अब अपने प्लान में थोड़ा परिवर्तन कर दिया था.<br />धड़धड़ाती हुई बुलेट मुसीबतचंद के ठीक सामने आकार रुकी और वोह चौंक कर आने वाले को देखने लगा. जिसका भारी भरकम शरीर कुरते पाजामे और सफ़ेद दाढ़ी में काफी शानदार लग रहा था.<br />वो व्यक्ति बुलेट से उतर कर मुसीबतचंद को देखता रहा फिर बोला, "का तुम ज्योतिषी हओ?" <br />"जी हाँ कहिये." मुसीबतचंद ने उत्तर दिया.<br />"बात ई है कि हमरा बिजनेस है, दूध का. हमरे इहाँ खालिस भईंस का दूध मिलत है." उसने बताया.<br />"अपनी जिस भैंस का भविष्य जानना चाहते हो उसका एक गिलास खालिस दूध पिला दो." खालिस दूध पाने का इससे अच्छा अवसर और कोई नही था. <br />"असल में आज हमरी एक भैंस भाग गई."<br />"किसके साथ?" मुसीबतचंद ने पूछा. <br />"केहू का साथ नाही. आज सुबे घास चरे गई रही. उहाँ दुई सांड भी थे. वह एक की ओर मुखातिब होए गई तो दुसरे को गुस्सा आये गवा. अब जौ उसने दौड़ाया तो बिचारी डर के मारे पता नही कहाँ गाएब होए गई. अब हमरा हाथ देख के बताव कि हमरी भैंस कब मिली?" दूधवाले ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.<br />मुसीबतचंद ने थैले में से लेंस निकलकर उसका हाथ देखना आरंभ किया. <br />"हम वादा करित है कि अगर हमरी भैंस मिल जैहै तो चालीस दिन तलक अपने गाहकों को खालिस दूध पिलैबये."<br />"तब तो तोहरी भैंस फौरन मिल जायेगी. तोहरे हाथ की लकीरें कहत थीं कि कल तलक तुम्हारी भैंस मिल जायेगी." दूधवाले की भाषा सुनकर मुसीबतचंद भी खिचडी भाषा बोलने लगा था.<br />"भगवन तोहार भला करे. उसके पीछे हमरा चार लीटर पेट्रोल अब तक फूंक गवा है." उसने दुबारा बुलेट पर बैठते हुए कहा.<br />"अच्छा तो दक्षिणा तो देते जाओ." किक मरते देखकर मुसीबतचंद बोला.<br />.........continued