लेखक - जीशान जैदी
नोट - ड्रामा पढने के लिए टाइटल पर क्लीक करें तत्पश्चात पी.डी.एफ. डाउनलोड करें.
Friday, May 16, 2008
हिन्दी कॉमेडी ड्रामा - पानी कहाँ हो तुम !
Thursday, May 15, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 34
"क्या मतलब?" मुसीबतचंद के स्वर में विस्मय था.
"मतलब ये कि मैं एक रेस्टोरेंट चलाता हूँ. एक दिन वो आया और बातों ही बातों में कहने लगा कि वो साउथ इंडिया से आया है और मेरे दोस्त वासुदेवन का संदेश लाया है. मैं ने उस पर विश्वास कर लिया. क्योंकि वास्तव में साउथ इंडिया में वासुदेवन मेरा मित्र था. उसने कहा कि वासुदेवन तुम्हारे साथ पार्टनरशिप करके साउथ में एक डोसा रेस्टोरेंट खोलने का विचार रखता है. मैं खुश हो गया क्योंकि इस तरह मेरे बिजनेस का विस्तार हो जाता. उसने अग्रीमेंट पेपर दिखाया, जिस पर मेरे मित्र के सिग्नेचर थे. मैं ने भी उस पर साइन कर दिए और दो लाख रूपये अग्रीमेंट के अनुसार बैंक अकाउंट में डोसा रेस्टोरेंट के नाम से जमा कर दिए. उसके बाद वो चला गया.
जब कई दिनों तक वो दुबारा नहीं आया तो मैं ने छानबीन की. उस समय मालुम हुआ कि अकाउंट में जमा दो लाख रूपये गायब हैं. और फिर जब मैं ने वासुदेवन से सम्पर्क किया तो मालुम हुआ कि उसने किसी भी व्यक्ति के हाथों कोई अग्रीमेंट नही भेजा था.
मुसीबतचंद भौंचक्का होकर उस व्यक्ति की कहानी सुन रहा था. वो कह रहा था, "मैं ने बड़ी मुश्किल से ये पता लगाया कि वो व्यक्ति किशोर इस मकान में रहता है. और उसका असली नाम हंसराज है. अब मैं उसे नही छोडूंगा."
"छोड़ने कि बात तो तब होगी जब आप उसे पकड़ पायेंगे. मेरा विचार है कि वो घर छोड़कर कहीं और जा चुका है." मुसीबतचंद बोला.
"कोई बात नहीं. ये मकान तो है. मैं इसे बेच दूँगा. मेरा विचार है कि इस मकान के कम से कम दस लाख मिल जायेंगे."
अभी वो ये बात कर ही रहा था कि पीछे से एक ज़ोरदार घूँसा उसकी गुददी पर पड़ा. और वो अपनी झोंक में आगे बढ़ता चला गया. फिर जो उसने घूमकर देखा तो एक उससे भी तगड़ा व्यक्ति कमर पर हाथ रखकर उसे घूर रहा था.
"क्यों जी , मेरे होते हुए मेरा ही मकान बेचने का प्लान कर रहा है. कौन है बे तू?" उसने गुस्से से पूछा.
....continued
Sunday, May 11, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 33
फिर काफी देर परेशान होने के बाद जब चाकलेट का पाउच फटकर उसके मुंह में मिठास घोलने लगा तो उसकी समझ में आया कि वो बत्तीसी के बजाये कुछ और अपने मुंह में रख चुका था.
"तुम ठीक तो हो सोनिया?" हंसराज सोनिया से पूछ रहा था. सोनिया ने स्वीकारात्मक रूप में सर हिलाया और रूमाल निकालकर अपने चेहरे को साफ करने लगी. क्योंकि बत्तीसी के साथ साथ थूक की छीटें भी उसके चेहरे पर पड़ी थीं. उसकी नाक लाल हो गई थी.
बूढे ने नकली बत्तीसी अपने मुंह में फिट की और बोला, "अच्छा तो अब मैं चलता हूँ."
इन लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की किंतु वो फिर रूका नही. क्योंकि अपनी बत्तीसी के कारण वो बुरी तरह शर्मिंदा हो गया था.
"चला गया कमबख्त. कहता था कि अभी तो मैं जवान हूँ." सोनिया बड़बड़ाई.
"आसामी मालदार लगता है. उस पर हाथ साफ किया जा सकता है." हंसराज कुछ और सोच रहा था.
"पोर्ट्रेट पर हाथ साफ करने के बाद अब कहीं और सेंध लगाने की क्या आवश्यकता रह गई है?" सोनिया बोली.
"धीरे बोलो. दीवारों के भी कान होते हैं. पोर्ट्रेट का मूल्य मिलने में हमें अभी देर लगेगी. तब तक काम चलने के लिए कहीं से इन्तिजाम करना ही पड़ेगा."
"क्या उसका कोई खरीदार मिला?"
"मैं ने तुमसे कहा न कि उसका खरीदार पहले से तै है. और वो हमें मुंह मांगी कीमत देगा."
" कौन है वो खरीदार?" सोनिया ने उत्सुकता से पूछा."
.......................
मुसीबतचंद ने आश्चर्य से घर को देखा. क्योंकि वहाँ पूरी तरह सन्नाटा छाया था.
वो अभी अभी थाने से घर पहुँचा था और ज्योतिषी कि वेशभूषा में था.
"कमाल है, कहाँ गये ये लोग? घर पर तो ऐसा सन्नाटा छाया है जैसे करफयू लग गया हो."
वो इधर उधर टहलने लगा. तभी किसी ने पीछे से उसका कालर पकड़ लिया और वो हडबडा कर पीछे हटा.
पीछे एक मोटा तगड़ा व्यक्ति खड़ा लाल लाल आँखों से उसे घूर रहा था. किंतु जब उसने मुसीबतचंद का चेहरा देखा तो तुरंत कालर छोड़ दिया.
"कौन हो तुम? हंसराज कहाँ है?" उस व्यक्ति ने पूछा.
"पता नही. मैं भी उसे ढूँढ रहा हूँ." मुसीबतचंद ने जवाब दिया.
"क्यों? क्या उसने तुम्हें भी चोट दी है?" उस व्यक्ति ने पूछा.
.........continued
Monday, May 5, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 32
"चीख क्यों रहे हैं? अगर इतना ही चाकलेट खाने का शौक है तो हम अपनी चाकलेट आपको दिए दे रहे हैं. सोनिया मैं तुम्हें दूसरी चाकलेट बाज़ार से खरीद दूँगा, ये चाकलेट श्रीमान जी को दे दो." सोनिया को संबोधित करते हुए हंसराज ने एक आंख दबाई.
"अरे वाह, मैं क्यों अपनी चाकलेट दूँ. अंकल, आप अपने लिए चाकलेट बाज़ार से खरीद लें." सोनिया ने बूढे को संबोधित किया और बूढा एकदम से ढीला पड़ गया.
"ठीक है मिस, मैं दूसरी चाकलेट ले लूंगा. किंतु मेरा विचार है कि मैं इतना बूढा भी नही हूँ कि आप मुझे अंकल कहिये." उसने सोनिया की तरफ मुस्कुराकर देखा और हंसराज अपना सर सहलाने लगा.
"आप खड़े क्यों हैं. बैठिये." सोनिया ने कहा और बूढा वहाँ रखी तीसरी कुर्सी पर बैठ गया.
"बाई दा वे, मुझे लोग सेठ धीरुमल कहते हैं. क्या मैं आपका शुभ नाम जान सकता हूँ?" बूढा अब लगातार सोनिया की ओर देख रहा था. हंसराज की ओर उसने एक बार भी नही देखा जो 'सेठ' शब्द सुनकर चौंक पड़ा था.
"मेरा नाम स..सीमा है." सही नाम बताने से पहले ही हंसराज ने सोनिया के पाँव पर अपना पाँव रख दिया. अतः सोनिया ने तुरंत अपना नाम बदल दिया.
"सीमा अच्छा नाम है. लगता है जैसे हर ओर फूलों की सुगंध फैल रही है." बूढा अब बहकने लगा था. सोनिया ने हंसराज की ओर देखा जिसके होंटों पर हलकी मुस्कराहट थी.
हंसराज ने सोनिया को इशारा किया और सोनिया ने पूछा, "सेठ जी, आपका कारोबार क्या है?"
"लगता है आप इस शहर में पहली बार आए हैं. सेठ धीरुमल को तो यहाँ का बच्चा बच्चा जनता है. यहाँ की सबसे मशहूर हलवाई की दूकान सेठ धीरुमल की है." उसने अकड़ कर कहा.
"ओह, तभी आपको मिठाइयाँ और चाकलेट बहुत पसंद हैं?" सोनिया बोली.
"हा..हा..हिप." कहकहा लगते हुए सेठ ने जल्दी से अपने मुंह पर हाथ रखा किंतु उससे पहले ही उसकी नकली बत्तीसी खुले मुंह से बाहर आई और सोनिया की नाक से किसी बुलेट की तरह टकरा गई.
सोनिया अपनी नाक पकड़कर झुक गई. हंसराज जल्दी से उठकर उसके पास पहुँचा और उसकी नाक सहलाने लगा. जबकि सेठ एकदम से शर्मिंदा हो गया था.
"माफ कीजियेगा. मैं भूल गया था की मेरी बत्तीसी नकली है." बौखलाहट में वो बत्तीसी के बजाये वहाँ रखा चाकलेट का पाउच अपने मुंह में लगाने लगा.
......continued
Saturday, May 3, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 31
"व्हाट!" इंसपेक्टर ने तेज़ आवाज़ में कहा, "कौन हो तुम और क्या बकवास कर रहे
हो."
"ये बकवास नही है. आप इसकी जांच करवा लें. मैं उसके बाद फिर फोन करूँगा." कहने
के साथ ही रिसीवर रख दिया गया.
इंसपेक्टर दिनेश ने रिसीवर रखा और तुरंत बाहर निकल गया.
....................
एक होटल के रिसेप्शन हाल में हंसराज और सोनिया इस समय मौजूद थे. हंसराज ध्यान
से उस बूढे को देख रहा था जो अब तक दो तीन चाकलेट के पैकेट अपनी जेब से निकलकर
चट कर चुका था.
"उधर गौर से क्या देख रहे हो." सोनिया ने हंसराज के चेहरे के सामने हाथ हिलाया.
इस समय वो भूरे रंग की साड़ी पहने थी जबकि हंसराज नीले रंग के थ्री पीस सूट में
था.
"मैं ये देख रहा हूँ कि वह बूढा होकर चाकलेट खा रहा है जबकि हम जवान होकर टाफी भी नही खा रहे हैं."
"तुम भी चाकलेट खरीद लाओ."
"ओ. के. तुम यहीं बैठो. मैं अभी आता हूँ." कहते हुए हंसराज उठा और उस दिशा में बढ़ने लगा जिधर बूढे की मेज़ थी. मेज़ के पास पहुंचकर वो इस प्रकार लड़खड़ाया मानो किसी चीज़ से ठोकर लगी है. किंतु तुरंत वो कुर्सी पकड़कर संभला और फिर आगे बढ़ गया. वहाँ से वापस वो अपनी मेज़ पर आ गया.
"क्या हुआ ? वापस क्यों आ गये?" सोनिया ने पूछा.
हंसराज ने अपनी जेब से चाकलेट के तीन चार पैकेट निकाल कर सोनिया के सामने रख दिए और तेज़ आवाज़ में बोला,"लो चाकलेट खाओ. जब बूढे चाकलेट खा सकते हैं तो हम लोग क्यों नहीं."
हंसराज का स्वर बूढे के कानों तक पहुँच चुका था. अतः वह चौंक कर इन्हें घूरने लगा. फिर जैसे ही उसने नया पैकेट निकलने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला, उसका चेहरा लाल हो गया और वह उठकर तीर की तरह इनकी मेज़ पर आया.
"तुमने मेरी जेब से चाकलेट निकाली है?" उसने तेज़ आवाज़ में पूछा.
"भला मैं क्यों तुम्हारी जेब से चाकलेट निकालने लगा. अपनी चाकलेट तुमने ख़ुद खाई होगी." हंसराज बोला.
"मैं कहता हूँ मेरी चाकलेट वापस करो." बूढा दहाड़ा और आसपास बैठे लोग चौंक कर उनकी ओर देखने लगे.
......continued
Tuesday, April 29, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 30
उसने फोन उठाया और फिर दूसरी तरफ़ की आवाज़ सुनते ही वो सावधान की मुद्रा में आ गया.
"क्या रहा?" दूसरी ओर से पूछा गया.
"काम हो गया बास. पोर्ट्रेट इस समय मेरे पास मौजूद है." वह बोला.
"गुड. अब ध्यान से सुनो. मि. एडगर कुछ ही देर में तुम्हारे पास पहुँचने वाले हैं. उनके साथ कलाकृतियों का एक एक्सपर्ट भी होगा, जो उस पोर्ट्रेट को चेक करेगा. उसकी संतुष्टि के बाद तुम मि. एडगर से ब्रीफकेस ले लेना जिसमें दस लाख डॉलर के नोट होंगे. उन्हें गिनने के बाद पोर्ट्रेट मि. एडगर को दे देना."
"ऐसा ही होगा बास. एक बात और आप से कहनी है."
"क्या बात है? उधर से पूछा गया.
"ये गंगाराम अपने पर फैलाने की कोशिश कर रहा है. क्या उसे ठिकाने लगा दिया जाये?"
"अभी उसे रहने दो. वक्त आने पर उसका इन्तिजाम हो जाएगा." कहने के साथ ही दूसरी ओर से कनेक्शन काट दिया गया.
......................
ये कंट्रोल रूम था.
जिसका सीधा सम्पर्क टी.वी. द्वारा आर्ट गैलरी से था. और यहाँ तीन ऑपरेटरों को केवल इसलिए रखा गया था कि वे हर पल लेओनार्दो के पोर्ट्रेट पर दृष्टि रखें.
इसके अलावा किसी भी इमर्जेंसी से निपटने के लिए बीस कमांडो की रैपिड एक्शन फोर्स वहाँ तैनात थी.
इस समय दो ओप्रेटर टी.वी. के सामने बैठे आर्ट गैलरी की हलचलों को देख रहे थे.
उसी समय वहाँ रखे फोन की घंटी घनघनाने लगी. वहाँ उपस्थित इं. दिनेश ने फोन उठाया.
"हेलो." वो बोला.
"क्या ये आर्ट गैलरी का कंट्रोल रूम है?" दूसरी ओर से पूछा गया.
"जी हाँ. आप कौन हैं?"
"मेरे बारे में जानना आपके लिए बेकार है. फिलहाल आप मेरी सूचना ध्यान से सुनें. वो ये है की आर्ट गैलरी में रखा पोर्ट्रेट नकली है. असली चोरी हो चुका है."
......continued
Thursday, April 24, 2008
चार सौ बीस - एपिसोड 29
"तुम सभी का काम काफी बढ़िया रहा." पोर्ट्रेट को अलमारी में रखने के पश्चात मनोहरश्याम बोला.
"ठीक समय पर बम फटा. रोशन भी कैमरे का कनेक्शन सही समय पर काटने में कामयाब हो गया.सौम्य अपना काम दिए गये समय के अंदर करने में कामयाब हो गया. अब यहाँ की सरकार सर पीटेगी जब उसे पता चलेगा कि म्यूज़ियम का असली पोर्ट्रेट गायब हो गया."
"वो विदेशी ग्राहक कौन है जो इस पोर्ट्रेट को खरीदना चाहता है?" सौम्य ने पूछा.
"संभवत वो यू.एस.ए. का है. किंतु ये मेरा केवल अनुमान है. नाम है माइक एडगर. वो इटली से इसका पीछा कर रहा था. यहाँ उसने इसे चुराने का मुझसे सौदा किया."
"वह इस पोर्ट्रेट को बाहर कैसे ले जाएगा? क्योंकि अब तक सरकार को पता लग चुका होगा की म्यूज़ियम में रखा पोर्ट्रेट नकली है. अब हर तरफ़ जांच चल रही होगी." रोशन बोला.
"इससे हमें कोई मतलब नही होना चाहिए. कुछ ही देर में वह आता होगा. हमें उससे रकम लेकर ये पोर्ट्रेट दे देना है. फिर हमारा काम समाप्त हो जाएगा. तुम लोग अब जाओ. तुम्हारा मेहनताना पचास पचास हज़ार रुपये दो तीन घंटों बाद तुम लोगों को मिल जायेंगे."
"वो विदेशी इस पोट्रेट के लिए कितनी रकम दे रहा है?" गंगाराम ने पूछा.
"मेरा विचार है कि इससे तुम्हें कोई मतलब नही होना चाहिए." मनोहरश्याम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा.
"मतलब तो है. क्योंकि इसी से हम पता करेंगे कि हमें मिलने वाला मेहनताना कम है या ठीक है." गंगाराम ने कुर्सी से पीठ टिकाते हुए कहा.
"अगर मेहनताना कम भी है तब भी तुम्हें गुज़ारा करना पड़ेगा. क्योंकि तुम लोगों को हर महीने बीस बीस हज़ार रूपये वेतन के रूप में इन्ही कामों के लिए मिलते हैं. और ये रकम उसके अलावा है.अब तुम लोग जा सकते हो." मनोहरश्याम ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.
फिर कोई कुछ नही बोला और वे लोग चुपचाप उठकर बाहर निकल गये.
उनके जाने के बाद वो अपने विचारों में लीन हो गया. उसकी तंद्रा उस समय भंग हुई जब पास रखे फोन की घंटी बजी.
........continued

