Thursday, January 8, 2009

ये सक्का से कहती है

योम ए अशूरा के इस ग़मगीन मौके पर हज़रत इमाम हुसैन को एक श्रद्धांजली इस नौहे के द्वारा

Monday, November 17, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 73

"और अब अपने फाएदे की बात सुनो. तुम तुंरत गाँव वापस जाओ क्योंकि वहीँ तुम्हें एक बड़ा लाभ होने वाला है."

"कैसा लाभ ज्योतिषी महाराज?"

"समय आने पर मालुम हो जाएगा. मैं जाता हूँ. मुझे देर हो रही है." मुसीबतचंद ने उसे रोकना चाहा किंतु वह जल्दी से पीछा छुड़ाकर आगे निकल गया.

"कैसा लाभ हो सकता है?" उसने अपने हाथ की लकीरों को देखना चाहा किंतु कोई सफलता नही मिली.

"थोड़े रुपये और कमा लूँ फिर गाँव को निकल जाऊंगा." उसने स्वयें से कहा और आवाज़ लगता हुआ आगे बढ़ गया.

...................

रोशन और सौम्य मनोहरश्याम के सामने पोर्ट्रेट लेकर पहुँच चुके थे. और अब उसे प्राप्त करने का पूरा किस्सा सुना रहे थे.
जब वे लोग पूरी बात बता चुके तो मनोहरश्याम कुछ क्षण मौन रहकर बोला, "तो ये पता नही लग पाया कि पोर्ट्रेट को चुराने वाला कौन था."

"नहीं. पुलिस को भी ये आभास नही हो पाया कि कब उसके पास से डालरों का सूटकेस पोर्ट्रेट में बदल दिया गया."
"ठीक है. तुम लोग कुछ देर बाद मुझसे मिलना. मैं थोडी देर के लिए एकांत चाहता हूँ. पोर्ट्रेट यहीं छोड़ दो."वे लोग बाहर निकल गए. उनके जाने के बाद मनोहरश्याम ने फोन उठाया और बॉस का नंबर मिलाने लगा. दूसरी ओर से तुंरत सम्बन्ध स्थापित हो गया.
"क्या रहा?" दूसरी ओर से पूछा गया. जवाब में मनोहरश्याम ने पूरी कहानी सुना दी. फिर बोला, "मेरा विचार है कि डालरों और पोर्ट्रेट कि अदला बदली इं.दिनेश के पहाड़ियों तक पहुँचने से पहले ही हो गई थी."

"यह तो साफ़ ही है. इसी कारण से इं.दिनेश को स्पेशल रास्ते से बुलाया गया था. वैसे पोर्ट्रेट मिल जाने से हमारा काफी सरदर्द दूर हो गया." बॉस ने कहा."किंतु यह समस्या अपने स्थान पर है कि वह अज्ञात चोर कौन है और किस प्रकार उसके पास पोर्ट्रेट पहुँचा."
"अज्ञात चोर वही है जिसका चित्र मैंने तुम्हारे पास भिजवाया है. जब हम उसकी भरतपुर में खोज कर रहे थे उस समय तक वह इस शहर में वापस आ चुका था.रही बात पोर्ट्रेट के उस तक पहुँचने की तो इसमें अवश्य हमारे किसी व्यक्ति का हाथ है. जो हमसे गद्दारी कर रहा है.और जब उसका पता चलेगा तभी हम यह ज्ञात कर पायेंगे कि पोर्ट्रेट किस प्रकार उसके पास पहुँचा."
"बॉस, गंगाराम का कई दिनों से कुछ पता नही है. मुझे तो पूरा विश्वास हो गया है कि गद्दार वही है."

Monday, November 3, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 72

"वाह वाह. क्या शानदार बात बताई. " उसने कहकहा लगाया, "बहुत मज़ा आता है गटर में. एक बार मैं गिर चुका हूँ. हर ओर खुशबू ही खुशबू. लगता है जैसे स्वर्ग में पहुँच गए. लेकिन वहां बोतल नही मिल पाती."
"कोई बात नहीं. बोतल तो तुम्हें असली स्वर्ग में भी नही मिलेगी."

"ऐसी बात है." वह तैश में आकर बोला, "फिर तो मैं स्वर्ग बिल्कुल नही जाऊँगा. मैं तो नर्क जाऊँगा. वहां तो बोतल मिलेगी?"
"जैसी आपकी मर्ज़ी. पाँच रुपये निकालो ताकि मैं आगे बढूँ."

"निकाल रहा हूँ. ऐसी भी क्या जल्दी है. आओ एक पैग हो जाए. मैं तो यारों का यार हूँ." उसने मुसीबतचंद का हाथ पकड़कर खींचा.

"नहीं. शराब मैं ने सौ साल पहले ही छोड़ दी थी. अब मेरी फीस पाँच रुपये निकालो."
"दे रहा हूँ. पाँच क्या मैं तुम्हें पाँच लाख दे रहा हूँ." उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक लॉटरी का टिकट निकालकर मुसीबतचंद की ओर बढ़ा दिया. जिसका पहला इनाम पूरे पाँच लाख का था."
"ये क्या दे रहो हो. चलो ठीक है आज मैं भी अपना भाग्य देख लूँ." उसने टिकट जेब में रख लिया और आगे बढ़ गया. शराबी भी झूमता हुआ आगे निकल गया.

कुछ दूर जाने के बाद अचानक मुसीबतचंद को कुछ ध्यान आया और वह जेब से टिकट निकालकर गौर से देखने लगा.
"धत तेरे की. ये तो छः महीने पुराना टिकट है." उसने टिकट वहीँ फाड़कर फेंक दिया.

थोडी दूर और आगे बढ़ने पर उसे सामने से एक और व्यक्ति आता दिखाई दिया. जिसने एक हाथ में सूटकेस पकड़ रखा था तथा दूसरे कंधे से बैग लटका रखा था."
"केवल पाँच रुपये में अपने भविष्य के बारे में सब कुछ जान लो." उसे देखते ही मुसीबतचंद ने आवाज़ लगाई. जब उस व्यक्ति ने कोई ध्यान नही दिया तो मुसीबतचंद उसके पास जाकर बोला, "भाई साहब, मैं आपका फ्यूचर बहुत ब्राईट देख रहा हूँ."
"ज़रूर देख रहे होगे. क्योंकि मैं स्वयें अपने फ्यूचर को अच्छी तरह जानता हूँ."

"आप कैसे जानते हैं?" मुसीबतचंद ने चौंक का पूछा."इसलिए क्योंकि मैं स्वयें ज्योतिषी हूँ. मैं ने यूरोप की प्रसिद्ध हस्तियों के भाग्य में लिखे को बताया है. कहो तो तुम्हारा भी भूत, भविष्य, वर्तमान सब कुछ बता दूँ."
"अपने बारे में तो मुझे भी जानना है. बहुत दिनों से मैं इस काम के लिए किसी को ढूँढ रहा था." मुसीबतचंद ने फ़ौरन अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया. वह कुछ देर उसका हाथ देखता रहा फ़िर बोला, "तो तुम्हारा नाम मुसीबतचंद है. तुम गाँव से आये हो. यहाँ पर हंसराज नाम के एक व्यक्ति के घर में रहे. जो बाद में तुम्हें छोड़कर कहीं चला गया."

मुसीबतचंद यह बातें सुनकर भौंचक्का हो गया, "इतना तो मैं भी किसी के बारे में बता नही पाता." वह बोला. उसे नही मालूम था कि उसके सामने मेकअप में हंसराज ही खड़ा है.

Friday, October 31, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 71

"जी हाँ. मेरा डाएरेक्ट कान्टेक्ट चाँद, तारों, ग्रहों सभी से हर समय रहता है. जब उनकी छाया मैं किसी की हथेली पर देखता हूँ तो उस हथेली के भविष्य के बारे में सब कुछ जान लेता हूँ."
"तो ठीक है. मेरा हाथ देखकर बताओ कि आजकल मेरे पति देर से घर क्यों आ रहे हैं. "

मुसीबतचंद कुछ देर उसके हाथ की लकीरें देखता रहा फिर बोला, "आजकल एक काली मुसीबत उनका पीछा कर रही है."

"मैं समझ गई. वही कलमुही होगी." अन्दर से क्रोधित स्वर में कहा गया.
"कौन कलमुही?" मुसीबतचंद ने पूछा.
"अरे वही. दफ्तर में क्लर्क है. काली कलूटी है, मगर दिमाग सातवें आसमान पर रहता है. मेरे पति को तो पूरी तरह अपने वश में कर लिया है. हाय हाय मेरी किस्मत फूटी थी जो ऐसा रंगीला पति मिला. शादी से पहले कहा करते थे कि शादी के बाद किसी लड़की की ओर आंख उठाकर भी न देखूँगा. अब तो मेरी ही ओर आंख उठाकर नही देखते. क्या बताऊँ." अन्दर शायद अपने माथे पर दोहत्थड़ मारा गया. मुसीबतचंद सकपकाया हुआ वहां खड़ा था.
उसकी समझ में नही आ रहा था कि अन्दर जाकर दिलासा दे या चुपचाप वहां से खिसक ले. किंतु खिसकने में पाँच रुपये की हानि हो रही थी. "बहन जी, सब्र कीजिये. बहुत जल्द हालत बदलेंगे और आपके पति आपकी ओर वापस पलट आयेंगे." वह बोला.
"अरे कैसे सब्र कर लूँ, चंद्राअचार जी. मैं तो अब छोडूंगी नहीं उन्हें. आने दो शाम को. अभी तक तो मुझे केवल शक था. आज वह ख़बर लूंगी कि ..." दांत पीसते हुए कहा गया.

"ज़रूर ख़बर लीजियेगा बहन जी. मेरा विचार है कि घर के सारे मज़बूत बर्तन ढूँढकर रख लीजिये. अच्छा मैं चलूँगा. यदि मेरी फीस दे दीजिये तो कृपा होगी." अन्तिम वाक्य वह धीरे से बोला.
अन्दर से उसी प्रकार बडबडाते हुए पॉँच रुपये थमा दिए गए.एक बार फिर वह आवाज़ लगाते हुए आगे बढ़ने लगा.

अभी वह थोडी ही दूर गया था कि सामने से आते एक व्यक्ति ने उसे रोक लिया. उस व्यक्ति के पांव लड़खड़ा रहे थे. और मुंह से आती गंध यह बता रही थी कि वह अभी अभी एक आध बोतल चढाकर निकला है.
"ए, क्या तुम भविष्य की बातें बताते हो?" उसने मुसीबतचंद के सामने ऊँगली लहराई.

"मेरा हाथ देखकर बताओ कि मुझे अगली बोतल कब मिलेगी." उसने लडखडाती ज़बान के साथ पूछा और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.

मुसीबतचंद ने उसका हाथ देखा और बोला, "गटर में गिरने के बाद."

Tuesday, October 28, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 70

जैसे ही इं.दिनेश की जीप कंट्रोल रूम के सामने रुकी, एक सिपाही उसके पास आया.
"आई जी साहब स्पेशल रूम में आपका इन्तिज़ार कर रहे हैं."

"ठीक है, मैं आता हूँ." इंजन बंद करने के बाद इं.दिनेश अन्दर प्रविष्ट हो गया.

"क्या समाचार है?" इं.दिनेश को देखते ही आई जी ने पूछा.
"वहां पर तो कहानी ही दूसरी हो गई. पोर्ट्रेट दूसरी पार्टी के पास चला गया और दस लाख डालर भी गए."

"मैं कुछ समझा नहीं. तुम विस्तार से बताओ."इं.दिनेश ने आरम्भ से अंत तक पूरी बात बता दी. इसमें डाल गिर जाने के कारण जंगल में जीप रोकने का किस्सा भी सम्मिलित था.
"तो इसका अर्थ ये हुआ कि डाल गिराकर पहले तुम्हारी जीप रोकी गई. फिर वहीँ पर उस चोर ने डालरों से पोर्ट्रेट की अदला बदली कर ली. फिर जब तुम पहाड़ियों पर पहुंचे तो वहां एक दूसरी पार्टी ने तुमसे पोर्ट्रेट हासिल कर लिया जो पहले से उसकी ताक में थी."
"दूसरी पार्टी का तो पता चल जाएगा, क्योंकि सूटकेस में छिपा दूरी व दिग्दर्शक यंत्र बता देगा कि वे लोग उसे कहाँ ले गए हैं. किंतु उस व्यक्ति का पता लगाना बहुत कठिन हो गया है जिसने डालर उड़ाए हैं." इं.दिनेश ने कहा.

"उसके बारे में बाद में विचार करेंगे. फिलहाल तुम पोर्ट्रेट हासिल करने की तय्यारी करो. क्योंकि अब समय बहुत कम रह गया है. कल शाम तक हमें उसे वापस इटली भेजना है."
"ठीक है. मैं अभी रेड डालने की तय्यारी करता हूँ. उन लोगों के फोटो भी मेरी अंगूठी के माइक्रो कैमरे में मौजूद हैं." इं.दिनेश बाहर जाने लगा.

"पता लगाओ कि सूटकेस कहाँ है. फिर मैं भी चलता हूँ." आई.जी. ने कहा. इं.दिनेश बाहर निकल गया.
--------------

मुसीबतचंद एक बार फिर ज्योतिषी के वेश में आ गया था. अब उसने पैसे कमाने का उपाए सोच लिया था.इस समय उसके हाथ में एक पोटली थी और वह एक गली से गुज़रते हुए चिल्ला रहा था, "विश्व के जाने माने ज्योतिषी श्री चंद्राचार्य से अपना हाथ दिखवा लो और केवल पाँच रुपये में भूत, भविष्य और वर्तमान सभी का हाल जान लो."
फिर एक दरवाज़ा खुला और उसकी दरार से एक हाथ निकलकर उसे बुलाने लगा. मुसीबतचंद तुंरत उसकी ओर बढ़ा.

"क्या तुम हाथ देखकर सब कुछ बता सकते हो?" अन्दर से महीन आवाज़ में पूछा गया.

Saturday, October 25, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 69

उसने सूटकेस भूमि पर रखा और खोलने लगा. इं.दिनेश भी गौर से उधर ही देख रहा था. उस व्यक्ति के हाथों में रखी टॉर्च की रोशनी सूटकेस पर पड़ रही थी.फिर सूटकेस के खुलते ही दोनों के मुंह से एक साथ निकला, "ओह! ये क्या?"
दोनों के स्वरों में विस्मय था. क्योंकि सूटकेस में डालरों की बजाए लेओनार्दो का पोर्ट्रेट रखा था.उस व्यक्ति ने प्रश्नात्मक दृष्टि से इं.दिनेश की ओर देखा.

"मुझे नही मालूम कि यह पोर्ट्रेट कैसे इसमें आ गया. जब मैं इसे लेकर चला था तो इसमें डालर भरे थे.: इं.दिनेश ने आश्चर्य से सूटकेस की ओर देखते हुए कहा.
"क्या बात है रोशन?" दूसरा व्यक्ति पहाडियों की ओट से निकला जिसके कंधे से राइफल लटक रही थी.

"यहाँ चमत्कार हुआ है सौम्य, इस सूटकेस में डालर लेओनार्दो के पोर्ट्रेट में बदल गए हैं." इस समय उन्हें यह भी ध्यान नही रह गया था कि इं.दिनेश के सामने वे लोग एक दूसरे को उनके नामों से पुकार रहे हैं.
"हूँ, इसका मतलब हुआ कि सौदा पहले ही गया. मेरा विचार है कि यह असली पोर्ट्रेट है जो डालरों के बदले में हासिल किया गया है." सौम्य ने इंसपेक्टर की ओर देखा.

"किंतु यह कैसे सम्भव है? मेरी रास्ते में किसी से मुलाकात तक नही हुई. तुम पहले व्यक्ति हो जो यहाँ पर मिले हो. मैं तो पहले यही समझा था की तुम्हारे पास ही पोर्ट्रेट है. किंतु अब समझ में आया कि तुम किसी दूसरी पार्टी के हो." इं.दिनेश बोला.
रोशन ने कुछ बोलना चाहा किंतु सौम्य ने उसे रोकते हुए कहा, "ठीक है. हम तो वैसे भी पोर्ट्रेट हासिल करने आये थे. और वह हमें मिल गया. रोशन सूटकेस उठा लो, हमें अब निकल चलना चाहिए. इंसपेक्टर अब तुम वापस पुलिस स्टेशन जाओ. हमारा पीछा करने की कोशिश मत करना क्योंकि यह तुम्हारे लिए खतरनाक हो सकता है."
रोशन ने सूटकेस उठाया और वे दोनों वापस पहाडियों की ओर चले गए. इं.दिनेश उन्हें जाता देखता रहा. जब वे दोनों गायब हो गए तो उसके होंटों पर एक रहस्यमय मुस्कराहट उभरी. फिर वह जीप में बैठकर वापस उसी रास्ते पर रवाना हो गया जिधर से आया था.

Friday, October 17, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 68

इं. दिनेश ने सिगरेट समाप्त करने के बाद रेडियम डायेल की घड़ी पर दृष्टि की. आठ बजकर दस मिनट हो गए थे. उसने मुंह खोलकर एक जम्हाई ली और बडबडाया, "कहाँ मर गया साला. लगता है डर गया. सपने में आने लगी होंगी पुलिस की हथकडियाँ."

उसी समय पहाडियों की ओट से एक व्यक्ति बाहर निकला जिसने अपने गले में लाल रूमाल लपेट रखा था. वह धीरे धीरे इं.दिनेश की ओर बढ़ने लगा. इं.दिनेश भी उसे देखकर सावधान होकर बैठ गया.

"पोर्ट्रेट कहाँ है?" पास आने पर इं.दिनेश ने उससे पूछा, क्योंकि वह व्यक्ति खाली हाथ था.
"हमें नहीं मालूम." आगंतुक ने उत्तर दिया.

"कमाल है. तुम्हें नहीं मालूम तो क्या इं पहाडियों को मालूम होगा! किस बात का सौदा करने के लिए मुझे यहाँ बुलाया गया है?" इं.दिनेश ने अपना बायाँ हाथ हिलाते हुए क्रोधित स्वर में कहा. आगंतुक को नहीं मालूम था कि इस बीच इं.दिनेश के हाथ की अंगूठी के कैमरे में उसकी तस्वीर कैद हो चुकी है. "मैंने सच कहा है कि मुझे पोर्ट्रेट के बारे में कुछ नहीं मालूम. मैं भी उसी व्यक्ति की प्रतीक्षा में था जिसे अब तक आ जाना चाहिए था. मैंने अभी अभी मोबाइल पर अपने बॉस से बात की है. उधर से आदेश आया है कि यदि पोर्ट्रेट नहीं मिला तो दस लाख डालर इं.दिनेश से लेकर आ जाओ."

"ओह! मैं समझा." इं.दिनेश ने सर हिलाया, "तो यह तुम्हारी योजना थी कि पोर्ट्रेट भी तुम रख लोगे और डालर भी हासिल करोगे. लेकिन यह सम्भव नही है." कहते हुए इंसपेक्टर ने रिवाल्वर निकाल लिया.
"रिवाल्वर चलाने से पहले तुम यह जान लो कि इस समय तुम्हारे ऊपर तीन राइफलें तनी हैं जो किसी भी समय तुम्हारे परखच्चे उदा सकती हैं. नमूना देख सकते हो." कहते हुए उस व्यक्ति ने अपनी टॉर्च से कोई संकेत किया और वहां के वातावरण में राइफलों की तड़तड़ाहट गूँज उठी.

"अब फ़ैसला तुम्हारे ऊपर निर्भर है." उसने कहा. इं.दिनेश ने यही उचित समझा कि रिवाल्वर दोबारा अपनी जेब में रख ले.
"ठीक है. तुम डालरों का सूटकेस ले जाओ. किंतु याद रखना कि अधिक देर क़ानून के हाथों नहीं बच सकोगे." इं.दिनेश ने उसे घूरते हुए कहा.

"क़ानून से तो हमारी आंख मिचौली चलती है. तुम सूटकेस मेरे सामने रख दो ताकि हम अपना इत्मीनान कर सकें."

"तुम स्वयम उठा लो. जीप की पिछली सीट पर रखा है."
वह व्यक्ति आगे बढ़ा और जीप से सूटकेस निकाल लाया.