Thursday, July 31, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 49

"उन्हें किसी तरह भनक मिल गई होगी. तुम अपने सभी आदमियों पर कड़ी दृष्टि रखो. और मुझे ये बताओ कि पोर्ट्रेट की नक़ल तैयार करने के लिए तुमने किसे भेजा था?"
"नक़ल तो मैं ने ख़ुद जाकर एक आर्टिस्ट से बनवाई थी." मनोहरश्याम ने जवाब दिया.
"मुझे उस आर्टिस्ट का नाम और पता बताओ." बॉस ने कहा और मनोहरश्याम उसका पता बताने लगा.
"ठीक है. मैं अब देख लूँगा. तुम गंगाराम पर कड़ी दृष्टि रखना." उधर से रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया गया. मनोहरश्याम ने भी रिसीवर नीचे किया और घंटी बजाई. एक आदमी अन्दर प्रविष्ट हुआ.
"गंगाराम को अन्दर भेज दो." मनोहरश्याम ने कहा.
"वे अपने केबिन में नहीं हैं." उस व्यक्ति ने जवाब दिया.
"कब से?"
"लगभग दो घंटे हो गए हैं."
"ठीक है. आते ही उसे भेज देना."
"ओ.के. बॉस." उस आदमी ने कहा और बाहर चला गया. मनोहरश्याम कुछ सोचने लगा था.
उधर मनोहरश्याम के बॉस ने रिसीवर क्रेडिल पर रखा और बड़बड़ाया, "मुझे तो सबसे ज़्यादा तुम पर ही शक है मनोहरश्याम, क्योंकि गंगाराम तो मैं ही हूँ." यह वास्तविकता थी कि मनोहरश्याम इससे अनजान था कि जिसे वो अपना अधीनस्थ समझता है वही दरअसल उसका बॉस है. जो उससे थोड़ी ही दूर पर अपने शानदार चैम्बर में बैठा है. इस समय उसके पास एक व्यक्ति और बैठा था जिसके चेहरे पर घनी दाढ़ी मूंछें थीं. सर कि पगड़ी, काला चश्मा और ढीले ढाले वस्त्रों ने उसका हुलिया इस प्रकार बना दिया था मानो वह अपनी पहचान छुपाना चाहता हो.
"लेकिन तुम मनोहरश्याम पर क्यों शक कर रहे हो?" सामने वाले ने पूछा. साफ लग रहा था कि वह आवाज़ बदलकर बोल रहा है.
"बात ये है कि मनोहरश्याम के अलावा और किसी को न तो सौदे के बारे में मालूम था कि कितने में हो रहा है और न ये मालूम था कि पोर्ट्रेट कि नक़ल कब और कहाँ से बनाई गई. मेरा विचार है कि मनोहरश्याम ने दो नकली पोर्ट्रेट बनवाये. एक उसने आर्ट गैलरी में रखवाया और दूसरा अपने पास रखकर एडगर को बेचना चाहा. लेकिन एडगर होशियार था. वरना मनोहरश्याम ने बहुत अच्छी चाल चाल चली थी. नकली पोर्ट्रेट का सौदा करके उसका पैसा हम लोगों को बांटता और असली पोर्ट्रेट का सौदा वह सरकार से करके सारा पैसा ख़ुद रखता. किंतु एडगर की होशियारी से उसकी चाल बेकार गई."
"फिर मनोहरश्याम से पता करना होगा कि असली पोर्ट्रेट उसने कहाँ रखा है. और उसे अपनी कस्टडी में लेना होगा." घनी दाढ़ी मूंछों वाले ने कहा.
"और हमें यह पता करने के लिए उस आर्टिस्ट से मिलना पड़ेगा. वही ये बता सकता है कि मनोहरश्याम ने कितने नकली पोर्ट्रेट बनवाये थे."
"लेकिन इतना झंझट पालने की क्या ज़रूरत? सीधे सीधे ये बात मनोहरश्याम पर टार्चर करके मालूम की जा सकती है."
"ये तो अन्तिम तरीका होगा. क्योंकि अगर मनोहरश्याम ने गद्दारी नहीं की है तो हम एक काम के आदमी से हाथ धो बैठेंगे. मैं नहीं चाहता कि फिलहाल उसे पता चले कि हम उस पर शक कर रहे हैं."
"ठीक है. जो तुम उचित समझो, करो. लेकिन पोर्ट्रेट का जल्द से जल्द पता चलना चाहिए. साथ ही ये कि वह भरतपुर किसके द्वारा पहुँचा और कहाँ पर है."घनी दाढी मूंछों वाला उठ खड़ा हुआ. उसके साथ साथ गंगाराम भी उठा.
"तुम मेरे सामने इस बहुरूप में क्यों आते हो? हम असली शक्ल में भी आमने सामने बात कर सकते हैं." गंगाराम ने ऊँगली से उस व्यक्ति के हुलिए की ओर संकेत किया.
............इन्तिज़ार करिए अगले गोल्डन जुबली एपिसोड का.

2 comments:

seema gupta said...

very interseting article....

महामंत्री-तस्लीम said...

गजब।
कितने एपीसोड तक जाएगी कहानी?