Thursday, July 17, 2008

बुफे दावत का आँखों देखा हाल - 2

निकाह ख़त्म हुए अभी कुछ ही देर हुई है. छुहारे लुट रहे हैं. बच्चों के साथ साथ पक्की उम्र के बुजुर्ग भी लाइन में कूद कूद कर उन्हें लूटने की कोशिश कर रहे हैं. अस्सी साल के अग्गन मियां कूद कर सब से आगे पहुँचते हैं और लपक कर छुहारा मुंह में डाल लेते हैं. तड़ाक की आवाज़ आती है, मालूम होता है अग्गन मियां की बत्तीसी टूट कर बाहर आ गई है.
खाने की शुरुआत का एलान हो चुका है, लिहाजा बाराती और घराती कंधे से कन्धा मिला कर एक तरफ़ सजी डिशेज़ की तरफ इस तरह बढ़ रहे हैं जैसे मैदाने जंग में सिपाही अपने मोर्चे की तरफ़ बढ़ते हैं. खाने की शुरुआत हो चुकी है. प्लेटें उछ्ल रही हैं. चमचे बज रहे हैं. और काबों में बोटियां खड़खड़ा रही हैं. हर तरफ़ चीख पुकार मची है. क़यामत का मंज़र है. बेटे को बाप का होश नही और बाप को बेटे की माँ का कुछ पता नही. सभी का एक तरफा टारगेट है बिरयानी और कोरमे की चमकती हुई डिशेज़. रशीद मियां अपनी प्लेट में मुर्गे की तीन टाँगें निकालने के बाद चौथी की तलाश में काब पर नज़र करते हैं. और जब घूम कर वापस देखते हैं तो उन की प्लेट में रखी तीनों टाँगें किसी और की प्लेट में पहुँच चुकी हैं. दूसरी तरफ़ शीरमाल के एक टुकड़े के लिए चार पहलवान नुमा साहबान ज़ोर आज़माइश कर रहे हैं. आखिरकार टुकडा चार टुकडों में अलग होता है. नतीजे में खलील साहब झटका खाकर मजीद मियां की प्लेट पर जा गिरते हैं. मजीद मियां के थ्री पीस सूट पर मुर्ग के पीसेस बिखर जाते हैं और वह खलील साहब का गिरेबान पकड़कर सलवातें भेजने लगते हैं. उधर फाजिल साहब बहुत देर से बकरे के सालन में एक अदद बोटी ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं. खुदा खुदा करके आखिरकार एक पीस मिलता है. मुंह में डाल कर जब चबाने की कोशिश करते हैं, तो मालूम होता है की वह किन्ही साहब का रूमाल है जो इस धमा चौकड़ी में बर्तन के अन्दर गिर गया था. दूसरी तरफ़ कडियल जवान कायम मियां अपने पच्चीस किलो वज़न के साथ उछ्ल कर शाही टुकड़े को लपकने की कोशिश कर रहे हैं. जो हर बार उनके हाथ से फिसल कर किसी न किसी की प्लेट में पहुँच जाता है. नन्हे मियां रूमाली रोटी लेने के चक्कर में मजमे के बीच में पिस कर ख़ुद रूमाल की तरह दिखाई दे रहे हैं. खलील साहब बहुत देर से चम्मच की तलाश में हैं ताकि उस की मदद से एक अदद गुलाब जामुन उठा सकें. आखिरकार मजबूरन उन्हें अपनी दो उँगलियों से काम लेना पड़ता है. जैसे ही गुलाब जामुन उन की उँगलियों के बीच आता है, एक ज़ोरदार धक्का उन के पूरे हाथ को शीरे में मय आस्तीन डुबो देता है. एक तरफ़ खड़े रफीक मियां भौंचक्के होकर उस मुर्ग पीस की तरफ़ देख रहे हैं जो हवा में तैरता हुआ जेट रफ़्तार से उनकी सफ़ेद शर्ट की तरफ़ बढ़ रहा है. उस से बचने की कोशिश में वो दाईं तरफ़ छलांग मारते हैं और बिरयानी की डिश पर जा पड़ते हैं. एक कोने में मौजूद चाऊमीन के स्टाल के पास ज़बरदस्त चियाऊं मियाऊं मची है. क्योंकि प्लेट एक ही बची है और लाइन में लगे पचास हैं. नतीजे में एक ज़ोरदार झटके के साथ प्लेट कई टुकडों में बिखरती हुई चाहने वालों के दिलों के टुकड़े टुकड़े कर देती है. जलील साहब प्लेट हाथ में थामे हुए एक तरफ़ क़नात में मौजूद छेद के आर पार देखने की कोशिश कर रहे हैं. क्योंकि उस पार रंग बिरंगे आँचल लहराती मोहतरमाएं तरह तरह के स्टाइल मार रही हैं. नज़र सेंकने के चक्कर में जलील साहब को ये भी होश नही की उनकी प्लेट तिरछी होकर उनके लक़ दक़ सूट का सत्यानाश कर रही है.
मोहतरमाओं की तरफ़ एक अलग ही रंग नज़र आ रहा है. दोशीज़ाएं एक हाथ से आंचल संभालती हुई प्लेट में कोरमा निकालने की कोशिश में परेशान हो रही हैं. एक मोहतरमा एक हाथ से अपने लाडले की नाक पोंछ रही हैं और दूसरे हाथ से कबाब खाने की कोशिश कर रही हैं. बच्चा भों भों रोता हुआ आइस क्रीम खाने की जिद कर रहा है. जिस के स्टाल के पास बुजुर्गों की अच्छी खासी तादाद होने की वजह से उसे मौका नही मिल रहा है. आखिरकार आजिज़ होकर मोहतरमा उसे एक थप्पड़ जड़ देती हैं और दोनों हाथों से कबाब खाने में मशगूल हो जाती हैं. पचपन साल की जमीला बेगम मुंह में भरी पान की पीक खाली करने की कोशिश में जगह की तलाश कर रही हैं. परदे के दूसरी तरफ़ उन्हें थूकदान नज़र आ जाता है. जमीला बेगम आव देखती हैं न ताव और जाकर पूरी पीक वहां थूक आती हैं. मालूम होता है वो दही का डोंगा था जो मुन्ने साहब मजमे की नज़र बचा कर वहां रख आए थे, ताकि खाने के बाद उसे पीकर हाजमा दुरुस्त कर सकें. फाखरा बेगम रस मलाई खाने में मशगूल हैं. पीछे से पुत्तु मियां दही का पूरा डोंगा उन की साड़ी के आंचल से छान कर उस में से मलाई अलग कर रहे हैं. रशीदा बाजी को अपने पीछे कुछ गीला महसूस होता है. घूम कर देखती हैं तो गुड्डू मियां अपनी मम्मी के कंधे पर सवार होकर उनकी पीठ को टायलेट की दीवार समझ कर अपनी ज़रूरत पूरी कर रहे हैं. गुस्से में रशीदा बाजी अपनी प्लेट में रखी मूली खींच कर उन्हें मार देती हैं. निशाना चूक कर फाखिरा बेगम की प्लेट में लैंड करता है और सारी रस मलाई छलक कर नसीमा आप के मुर्ग पीस पर बिखर जाती है. नसीमा आप गुस्से में फाखिरा बेगम की तरफ़ प्लेट ही उछाल देती हैं. ताक़त कुछ ज़्यादा लग जाती है और प्लेट जाकर शाकिर मियां की चाँद पर फिट हो जाती है. शाकिर मियां फाजिल साहब को मुजरिम समझ कर पूरा खीर का प्याला उनकी तरफ़ उछाल देते हैं लेकिन बद किस्मती से वह प्याला जलील मियां के निवाले के साथ हमप्याला हो जाता है. अब चारों तरफ़ धुआं धार जंग शुरू हो चुकी है. प्याले, चमचे और डिशेज़ राकेट और मिसाइलों की तरह हवा में तैर रहे हैं और खूबसूरत लिबासों की हवा ख़राब कर रहे हैं. ज़र्दे की एक प्लेट मेरी इकलौती कैमरा नुमा आंख पर भी आकर फिट हो चुकी है, लिहाजा आगे का आँखों देखा हाल सुनाना अब मुमकिन नही रहा.

Zeashan Zaidi

1 comment:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Ekdam sajeev chitran hai. Mubarakbaad kubool farmaayen.