Saturday, March 15, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 20

"मेरा ख्याल है कि अगर हम पहरेदारों को चकमा दे दें तो लोहे की जाली तोड़कर पोर्ट्रेट उड़ाना आसान होगा." सोनिया ने अपना विचार प्रकट किया. इस समय घर में केवल हंसराज और सोनिया थे. मुसीबतचंद कहीं बाहर गया था.
"और ये कार्य हम केवल प्रदर्शनी के समय कर सकते हैं. क्योंकि मुझे हंड्रेड परसेंट विश्वास है कि प्रदर्शनी के बाद तारों में करेंट दौड़ दिया जाता होगा." हंसराज बोला.
"ये तुम किस तरह पूरे विश्वास के साथ कह सकते हो?"
"इसलिए, क्योंकि मुझे इस फील्ड में तुमसे कई गुना ज़्यादा तजुर्बा है. इस तरह के मामलों में यही होता है. दो बार मैं करंट का झटका खाने से बचा हूँ." हंसराज बोला, "इसके अलावा जैसे ही वहां से पोर्ट्रेट गायब होगा, फौरन पुलिस को पता चल जायेगा. क्योंकि आर्ट गैलरी का पुलिस कंट्रोल रूम से हमेशा सम्पर्क बना रहता है. इसलिए थोडी सी भी गड़बड़ होने पर पुलिस तुरंत दौड़ पड़ेगी."
"फिर क्या तरकीब हो सकती है पोर्ट्रेट उड़ाने की?" सोनिया को अब निराशा होने लगी थी.
"एक काम हो सकता है. हम इस काम में मुसीबतचंद की मदद लेते हैं." हंसराज ने कहा.
"भला वो बेवकूफ क्या करेगा? बल्कि वो तो काम बिगाड़ देगा." सोनिया को ख्याल पसंद नही आया.
"पूरी बात सुनो. मैं ने एक प्लान बनाया है. लेकिन प्लान सुनाने से पहले मैं पहले एक चीज़ दिखाता हूँ." हंसराज एक कोने में रखा ब्रीफकेस उठा लाया और उसे सोनिया के सामने खोल दिया. इसी के साथ सोनिया की ऑंखें आश्चर्य से फैल गईं.
ब्रीफकेस के अन्दर लेओनार्दो की कलाकृति मौजूद थी.
"आश्चर्य मत करो. ये पोर्ट्रेट नकली है." हंसराज ने तुरंत सस्पेंस तोड़ दिया. " कल मुझे बाज़ार घुमते समय संयोग से एक फोटोग्राफर के पास मिल गया. और उसी समय मेरे मस्तिष्क में पूरी योजना भी घूम गई. मैं ने पाँच सौ रूपये देकर इसे खरीद लिया."
"तो तुम्हारी योजना है क्या आख़िर?"
......continued

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