Tuesday, October 28, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 70

जैसे ही इं.दिनेश की जीप कंट्रोल रूम के सामने रुकी, एक सिपाही उसके पास आया.
"आई जी साहब स्पेशल रूम में आपका इन्तिज़ार कर रहे हैं."

"ठीक है, मैं आता हूँ." इंजन बंद करने के बाद इं.दिनेश अन्दर प्रविष्ट हो गया.

"क्या समाचार है?" इं.दिनेश को देखते ही आई जी ने पूछा.
"वहां पर तो कहानी ही दूसरी हो गई. पोर्ट्रेट दूसरी पार्टी के पास चला गया और दस लाख डालर भी गए."

"मैं कुछ समझा नहीं. तुम विस्तार से बताओ."इं.दिनेश ने आरम्भ से अंत तक पूरी बात बता दी. इसमें डाल गिर जाने के कारण जंगल में जीप रोकने का किस्सा भी सम्मिलित था.
"तो इसका अर्थ ये हुआ कि डाल गिराकर पहले तुम्हारी जीप रोकी गई. फिर वहीँ पर उस चोर ने डालरों से पोर्ट्रेट की अदला बदली कर ली. फिर जब तुम पहाड़ियों पर पहुंचे तो वहां एक दूसरी पार्टी ने तुमसे पोर्ट्रेट हासिल कर लिया जो पहले से उसकी ताक में थी."
"दूसरी पार्टी का तो पता चल जाएगा, क्योंकि सूटकेस में छिपा दूरी व दिग्दर्शक यंत्र बता देगा कि वे लोग उसे कहाँ ले गए हैं. किंतु उस व्यक्ति का पता लगाना बहुत कठिन हो गया है जिसने डालर उड़ाए हैं." इं.दिनेश ने कहा.

"उसके बारे में बाद में विचार करेंगे. फिलहाल तुम पोर्ट्रेट हासिल करने की तय्यारी करो. क्योंकि अब समय बहुत कम रह गया है. कल शाम तक हमें उसे वापस इटली भेजना है."
"ठीक है. मैं अभी रेड डालने की तय्यारी करता हूँ. उन लोगों के फोटो भी मेरी अंगूठी के माइक्रो कैमरे में मौजूद हैं." इं.दिनेश बाहर जाने लगा.

"पता लगाओ कि सूटकेस कहाँ है. फिर मैं भी चलता हूँ." आई.जी. ने कहा. इं.दिनेश बाहर निकल गया.
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मुसीबतचंद एक बार फिर ज्योतिषी के वेश में आ गया था. अब उसने पैसे कमाने का उपाए सोच लिया था.इस समय उसके हाथ में एक पोटली थी और वह एक गली से गुज़रते हुए चिल्ला रहा था, "विश्व के जाने माने ज्योतिषी श्री चंद्राचार्य से अपना हाथ दिखवा लो और केवल पाँच रुपये में भूत, भविष्य और वर्तमान सभी का हाल जान लो."
फिर एक दरवाज़ा खुला और उसकी दरार से एक हाथ निकलकर उसे बुलाने लगा. मुसीबतचंद तुंरत उसकी ओर बढ़ा.

"क्या तुम हाथ देखकर सब कुछ बता सकते हो?" अन्दर से महीन आवाज़ में पूछा गया.

2 comments:

ummed Singh Baid "saadahak " said...

चौंकाया है आपने,बाँधी मन की डोर.
पाठक खिंच के आयेगा,उपन्यास की और.
उपन्यास की और, मुसीबत चन्द के पीछे.
हो सकता है मैं भी आऊँ पीछे-पीछे.
कह साधक कवि,खत्री दिलाया याद आपने.
बाँधी मन की डोर चौंकाया है आपने.

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ख़ूब...बेहद दिलचस्प...