Saturday, October 4, 2008

चार सौ बीस - एपिसोड 63

हंसराज ने पहाडियों की सीमा आरंभ होने से लगभग पाँच किलोमीटर पहले ही बस छोड़ दी. इस समय वह जिस स्थान पर खड़ा था, वहां से आठ दस कदम दूर मेन रोड से एक शाख निकल कर जंगल के अन्दर गई थी. उस जंगल का विस्तार लगभग दो किलोमीटर था और उसके बाद वह रास्ता एक मैदान से होता हुआ पहाडियों पर पहुँचता था. हंसराज ने इसी रास्ते से उस सरकारी नुमाइंदे को बुलाया था जिसे डालरों से भरा सूटकेस देकर पोर्ट्रेट लेना था.

हंसराज ने उस रास्ते पर चलना आरंभ कर दिया. यह रास्ता इतना चौड़ा था कि एक जीप आसानी से उस पर गुज़र सकती थी. हालाँकि मेन रोड भी आगे जाकर पहाडियों कि और घूम जाती थी, किंतु यह रास्ता शोर्ट कट पसंद करने वालों के लिए काफी उपयुक्त था.इस समय शाम के छह बज रहे थे और जंगल में अच्छा खासा अन्धकार हो गया था. अतः हंसराज ने जेब से पेन्सिल टॉर्च निकालकर जला ली और उसकी रौशनी में आगे बढ़ने लगा.
जंगली जानवरों की आवाजें लगातार सुनाई पड़ रही थीं. किंतु हंसराज को उधर से कोई खतरा नही था. उसे मालूम था कि इस जंगल में कोई खतरनाक जानवर नही है. वह चलते हुए दाएं बाएँ भी देखता जा रहा था.
लगभग बीस पच्चीस मिनट चलने के बाद वह रूक गया और ऊपर देखने लगा जहाँ एक पेड़ की डाल काफी नीचे झुकी थी. इस स्थान से जंगल का दूसरा छोर काफी पास था. उसने सूटकेस को एक झाड़ी में छिपाया और बैग लेकर पेड़ पर चढ़ गया. फिर उसने बैग से लकड़ी काटने की आरी निकाली और अगले ही पल वह उस डाल पर तेज़ी से हाथ चला रहा था जो सड़क पर झुकी थी.
जंगल के जानवरों के शोर में आरी की ध्वनि भी किसी जानवर की आवाज़ प्रतीत हो रही थी. उसका मस्तक पसीने से भीग गया, किंतु वह लगातार आरी चलाए जा रहा था. फिर उसका हाथ तब रुका जब डाल टूटकर सड़क पर आ गिरी. उसने अपनी घड़ी में समय देखा. इस समय ठीक सात बज रहे थे.

उसने पहाडियों की ओर देखा. चूंकि गर्मी का मौसम था अतः अभी भी पहाड़ियों पर हलकी रौशनी थी, जो तेज़ी से अन्धकार में बदल रही थी.हंसराज ने बैग से एक दूरबीन निकाली और उसे अपनी आंखों पर चढाकर दोबारा पहाड़ियों की ओर देखने लगा. फिर उसके होंठों पर एक हलकी सी मुस्कराहट चमकी क्योंकि उसे वहां किसी व्यक्ति के कपड़े की झलक दिखाई पड़ गई थी. जो एक चट्टान की ओट में बैठा था.

"तो मेरे स्वागत का पहले से इन्तिजाम है." वह बड़बड़ाया.वह पेड़ से नीचे उतरा और उस झाडी के पास पहुँचा जहाँ उसने सूटकेस छिपाया था. वह भी वहीँ छिपकर बैठ गया. कीड़े मकोड़ों से बचने के लिए उसने लॉन्ग बूट पहन रखे थे.
समय बीतता रहा और वह वहीँ बैठकर ऊंघता रहा. फिर उस समय लगभग साढ़े सात बजे होंगे जब एक जीप की घरघराहट उसे सुनाई दी. और वह चौकन्ना होकर बैठ गया.

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत मजा आ रहा है पढ़ने में..जारी रहें.

फ़िरदौस ख़ान said...

अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर...

हमने अपने ब्लॉग में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है...

Zeashan Zaidi said...

Thank you Firdaus Ji