"क्या मतलब?" मुसीबतचंद के स्वर में विस्मय था.
"मतलब ये कि मैं एक रेस्टोरेंट चलाता हूँ. एक दिन वो आया और बातों ही बातों में कहने लगा कि वो साउथ इंडिया से आया है और मेरे दोस्त वासुदेवन का संदेश लाया है. मैं ने उस पर विश्वास कर लिया. क्योंकि वास्तव में साउथ इंडिया में वासुदेवन मेरा मित्र था. उसने कहा कि वासुदेवन तुम्हारे साथ पार्टनरशिप करके साउथ में एक डोसा रेस्टोरेंट खोलने का विचार रखता है. मैं खुश हो गया क्योंकि इस तरह मेरे बिजनेस का विस्तार हो जाता. उसने अग्रीमेंट पेपर दिखाया, जिस पर मेरे मित्र के सिग्नेचर थे. मैं ने भी उस पर साइन कर दिए और दो लाख रूपये अग्रीमेंट के अनुसार बैंक अकाउंट में डोसा रेस्टोरेंट के नाम से जमा कर दिए. उसके बाद वो चला गया.
जब कई दिनों तक वो दुबारा नहीं आया तो मैं ने छानबीन की. उस समय मालुम हुआ कि अकाउंट में जमा दो लाख रूपये गायब हैं. और फिर जब मैं ने वासुदेवन से सम्पर्क किया तो मालुम हुआ कि उसने किसी भी व्यक्ति के हाथों कोई अग्रीमेंट नही भेजा था.
मुसीबतचंद भौंचक्का होकर उस व्यक्ति की कहानी सुन रहा था. वो कह रहा था, "मैं ने बड़ी मुश्किल से ये पता लगाया कि वो व्यक्ति किशोर इस मकान में रहता है. और उसका असली नाम हंसराज है. अब मैं उसे नही छोडूंगा."
"छोड़ने कि बात तो तब होगी जब आप उसे पकड़ पायेंगे. मेरा विचार है कि वो घर छोड़कर कहीं और जा चुका है." मुसीबतचंद बोला.
"कोई बात नहीं. ये मकान तो है. मैं इसे बेच दूँगा. मेरा विचार है कि इस मकान के कम से कम दस लाख मिल जायेंगे."
अभी वो ये बात कर ही रहा था कि पीछे से एक ज़ोरदार घूँसा उसकी गुददी पर पड़ा. और वो अपनी झोंक में आगे बढ़ता चला गया. फिर जो उसने घूमकर देखा तो एक उससे भी तगड़ा व्यक्ति कमर पर हाथ रखकर उसे घूर रहा था.
"क्यों जी , मेरे होते हुए मेरा ही मकान बेचने का प्लान कर रहा है. कौन है बे तू?" उसने गुस्से से पूछा.
....continued
Thursday, May 15, 2008
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