"व्हाट!" इंसपेक्टर ने तेज़ आवाज़ में कहा, "कौन हो तुम और क्या बकवास कर रहे
हो."
"ये बकवास नही है. आप इसकी जांच करवा लें. मैं उसके बाद फिर फोन करूँगा." कहने
के साथ ही रिसीवर रख दिया गया.
इंसपेक्टर दिनेश ने रिसीवर रखा और तुरंत बाहर निकल गया.
....................
एक होटल के रिसेप्शन हाल में हंसराज और सोनिया इस समय मौजूद थे. हंसराज ध्यान
से उस बूढे को देख रहा था जो अब तक दो तीन चाकलेट के पैकेट अपनी जेब से निकलकर
चट कर चुका था.
"उधर गौर से क्या देख रहे हो." सोनिया ने हंसराज के चेहरे के सामने हाथ हिलाया.
इस समय वो भूरे रंग की साड़ी पहने थी जबकि हंसराज नीले रंग के थ्री पीस सूट में
था.
"मैं ये देख रहा हूँ कि वह बूढा होकर चाकलेट खा रहा है जबकि हम जवान होकर टाफी भी नही खा रहे हैं."
"तुम भी चाकलेट खरीद लाओ."
"ओ. के. तुम यहीं बैठो. मैं अभी आता हूँ." कहते हुए हंसराज उठा और उस दिशा में बढ़ने लगा जिधर बूढे की मेज़ थी. मेज़ के पास पहुंचकर वो इस प्रकार लड़खड़ाया मानो किसी चीज़ से ठोकर लगी है. किंतु तुरंत वो कुर्सी पकड़कर संभला और फिर आगे बढ़ गया. वहाँ से वापस वो अपनी मेज़ पर आ गया.
"क्या हुआ ? वापस क्यों आ गये?" सोनिया ने पूछा.
हंसराज ने अपनी जेब से चाकलेट के तीन चार पैकेट निकाल कर सोनिया के सामने रख दिए और तेज़ आवाज़ में बोला,"लो चाकलेट खाओ. जब बूढे चाकलेट खा सकते हैं तो हम लोग क्यों नहीं."
हंसराज का स्वर बूढे के कानों तक पहुँच चुका था. अतः वह चौंक कर इन्हें घूरने लगा. फिर जैसे ही उसने नया पैकेट निकलने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला, उसका चेहरा लाल हो गया और वह उठकर तीर की तरह इनकी मेज़ पर आया.
"तुमने मेरी जेब से चाकलेट निकाली है?" उसने तेज़ आवाज़ में पूछा.
"भला मैं क्यों तुम्हारी जेब से चाकलेट निकालने लगा. अपनी चाकलेट तुमने ख़ुद खाई होगी." हंसराज बोला.
"मैं कहता हूँ मेरी चाकलेट वापस करो." बूढा दहाड़ा और आसपास बैठे लोग चौंक कर उनकी ओर देखने लगे.
......continued
Saturday, May 3, 2008
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